About Me

  • June 2020
  • PDF

This document was uploaded by user and they confirmed that they have the permission to share it. If you are author or own the copyright of this book, please report to us by using this DMCA report form. Report DMCA


Overview

Download & View About Me as PDF for free.

More details

  • Words: 13,279
  • Pages: 19
1 कौन सा समय है मेरे िमत्र कौन हं शत्रु कौन हं कौन सा देश, स्थान है मेरी अय-व्यय क्या है मं कौन हूँ मेरी शिि ककतनी है आत्याकद बातं का बराबर ििचार करते रहो। सभी ििचारकं ने ज्ञान का एक ही स्िरूप बताया है िह है अत्म-बोध । ऄपने सम्बन्ध मं पूरी जानकारी प्राप्त कर लेने के बाद कु छ जानना शेष नहं रह जाता। जीि ऄसल मं इश्वर ही है। ििचारं से बँधकर िह बुरे रूप मं कदखाइ देता है परन्तु ईसके भीतर ऄमूल्य िनिध भरी हुइ है। शिि का िह के न्र है और आतना है िजसकी हम कल्पना भी नहं कर सकते। सारी कठिनाइयाँ सारे दुख आसी बात के हं कक हम ऄपने को नहं जानते। जब अत्म स्िरूप को समझ जाते हं तब ककसी प्रकार का कोइ कष्ट नहं रहता। अत्म स्िरूप का ऄनुभि कहता है- मं ईत्पन्न नहं हुअ हूँ किर मेरा जन्म मृत्यु कै से मं प्राण नहं हूँ किर भूख-प्यास मुझे कै सी मं िचत्त नहं हूँ किर मुझे शोक-मोह कै से मं कताा नहं हूँ किर मेरा बन्ध-मोक्ष कै से जब िह समझ जाता है कक मं क्या हूँ तब ईसे िास्तििक ज्ञान हो जाता है और सब पदाथं का रूप िीक से देखकर ईसका ईिचत ईपयोग कर सकता है। चाहे ककसी दृिष्ट से देखा जाय अत्मज्ञान ही सिासुलभ और सिोच्च िहरता है। ककसी व्यिि से पूछा जाय कक अप कौन हं तो िह ऄपने िणा कु ल व्यिसाय पद या सम्प्रदाय का पठरचय देगा। ब्राह्राण हूँ ऄग्रिाल हूँ बजाज हूँ तहसीलदार हूँ िैष्णि हूँ अकद ईत्तर हंगे। ऄिधक पूछने पर ऄपने िनिास स्थान िंश व्यिसाय अकद का ऄिधकािधक ििस्तृत पठरचय देगा। प्रश्न के ईत्तर के िलए ही यह सब िणान हं सो नहं ईत्तर देने िाला यथाथा मं ऄपने को िैसा ही मानता है। शरीर-भाि मं मनुष्य आतना तल्लीन हो गया है कक ऄपने अपको िह शरीर ही समझने लगा है। िंश िणा व्यिसाय या पद शरीर का होता है। शरीर मनुष्य का एक पठरधान औजार है। परन्तु भ्रम और ऄज्ञान के कारण मनुष्य ऄपने अपको शरीर ही मान बैिता है और शरीर के स्िाथा तथा ऄपने स्िाथा को एक कर लेता है। आसी गड़बड़ी मं जीिन ऄनेक ऄशािन्तयं िचन्ताओं और व्यथाओं का घर बन जाता है। मनुष्य शरीर मं रहता है यह िीक है पर यह भी िीक है कक िह शरीर नहं है। जब प्राण िनकल जाते हं तो शरीर ज्ययं का त्यं बना रहता है ईसमं से कोइ िस्तु घटती नहं तो भी िह मृत शरीर बेकाम हो जाता है। ईसे थोड़ी देर रखा रहने कदया जाय तो लाश सड़ने लगती है दुगान्ध ईत्पन्न होती है और कृ िम पड़ जाते हं। देह िही है ज्ययं की त्यं है पर प्राण िनकलते ही ईसकी दुदश ा ा होने लगती है। आससे प्रकट है कक मनुष्य शरीर मं िनिास तो करता है पर िस्तुतः िह शरीर से िभन्न है। आस िभन्न सत्ता को अत्मा कहते हं। िास्ति मं यही मनुष्य है। मं क्या हूँ आसका सही ईत्तर यह है कक मं अत्मा हूँ। शरीर और अत्मा की पृथकता की बात हम लोगं ने सुन रखी है। िसद्घान्ततः हम सब ईसे मानते भी है। शायद कोइ ऐसा ििरोध करे कक देह से जीि पृथक नहं है आस पृथकता की मान्यता िसद्घान्त रूप से जैसे सिा साधरण को स्िीकार है। िैसे ही व्यिहार मं सभी लोग ईसे ऄस्िीकार करते हं। लोगं के व्यिहार ऐसे होते हं मानो िे िस्तुतः शरीर ही हं। शरीर के हािन-लाभ ईनके हािन-लाभ हं। ककसी व्यिि का बारीकी के साथ िनरीक्षण ककया जाय और देखा जाय कक िह क्या सोचता है क्या कहता है और क्या करता है तो पता चलेगा कक िह शरीर के बारे मं सोचता है ईसी के सम्बन्ध मं सम्भाषण करता है और जो कु छ करता है शरीर के िलए करता है। शरीर को ही ईसने मं मान रखा है। शरीर अत्मा का मिन्दर है। ईसकी स्िस्थता स्िच्छता और सुििधा के िलए काया करना ईिचत एिं अिश्यक है परन्तु यह ऄिहतकर है कक के िल मात्र शरीर के ही बारे मं सोचा जाय ईसे ऄपना स्िरूप मान िलया जाय और ऄपने िास्तििक स्िरूप को भुला कदया जाय। ऄपने अपको शरीर

मान लेने के कारण शरीर के हािन-लाभं को भी ऄपने हािन-लाभ मान लेता है और ऄपने िास्तििक िहतं को भूल जाता है। यह भूल-भुलैया का खेल जीिन को बड़ा कका श और नीरस बना देता है। अत्मा शरीर से पृथक् है। शरीर और अत्मा के स्िाथा भी पृथक हं। शरीर के स्िाथं का प्रितिनिधत्ि आिन्रयाँ करती हं। दस आिन्रयाँ और ग्यारहिाँ मन यह सदा ही शारीठरक दृिष्टकोण से सोचते और काया करते हं। स्िाकदष्ट भोजन बकिया िस्त्र सुन्दर-सुन्दर मनोहर दृश्य मधुर श्रिण रूपिती स्त्री नाना प्रकार के भोग-ििलास यह आिन्रयं की अकांक्षाएँ हं। उँचा पद ििपुल धन दूरदूर तक यश रौब दाब यह सब मन की अकांक्षाएँ हं। आन्हं आच्छाओं को तृप्त करने मं प्रायः सारा जीिन लगता है। जब यह आच्छाएँ ऄिधक ईग्र हो जाती हं तो मनुष्य ईनकी ककसी भी प्रकार से तृिप्त करने की िान लेता है और ईिचत ऄनुिचत का ििचार छोड़कर जैसे भी बने स्िाथा साधने की नीित पर ईतर अता है। यही समस्त पापं का मूल के न्र िबन्दु है। शरीर भाि मं जाग्रत रहने िाला मनुष्य यकद अहार िनरा भय मैथुन के साधारण कायाक्रम पर चलता रहे तो भी ईस पशुित जीिन मं िनरथाकता ही है साथाकता कु छ नहं। यकद ईसकी आच्छाएँ जरा ऄिधक ईग्र या अतुर हो जायं तब तो समिझये कक िह पूरा पाप पुंज शैतान बन जाता है ऄनीितपूिाक स्िाथा साधने मं ईसे कु छ भी िहचक नहं होती। आस दृिष्टकोण के व्यिि न तो स्ियं सुखी रहते हं और न दूसरं को सुखी रहने देते हं। काम और लोभ ऐसे तत्ि हं कक ककतना ही ऄिधक से ऄिधक भोग क्यं न िमले िे तृप्त नहं होते िजतना ही िमलता है ईतनी ही तृष्णा के साथ-साथ ऄशािन्त िचन्ता कामना तथा व्याकु लता भी कदन दूनी और रात चौगुनी होती चलती है। आन भोगं मं िजतना सुख िमलता है ईससे ऄनेक गुना दुख भी साथ ही साथ ईत्पन्न होता चलता है। आस प्रकार शरीर दृिष्टकोण मनुष्य को पाप ताप तृिप्त तथा परक ऄशािन्त की ओर घसीट ले जाता है। जीिन की िास्तििक सिलता और समृिद्घ अत्मभाि मं जागृत रहने मं है। जब मनुष्य ऄपने को अत्मा ऄनुभि करने लगता है तो ईसकी आच्छा अकांक्षा और ऄिभरूिच ईन्हं कामं की ओर मुड़ जाती है िजनसे अध्याित्मक सुख िमलता है। हम देखते हं कक चोरी हिहसा व्यिभचार छल एिं ऄनीित भरे दुष्कमा करते हुए ऄन्तःकरण मं एक प्रकार का कु हराम मच जाता है पाप करते हुए पाँि काँपते हं और कलेजा धड़कता है आसका तात्पया यह है कक आन कामं को अत्मा नापसन्द करता है। यह ईसकी रुिच एिं स्िाथा के ििपरीत है। ककन्तु जब मनुष्य परोपकार परमाथा सेिा सहायता दान ईदारता त्याग तप से भरे हुए पुण्य कमा करता है। तो हृदय के भीतरी कोने मं बड़ा ही सन्तोष हलकापन अनन्द एिं ईल्लास ईिता है। आसका ऄथा है कक यह पुण्य कमा अत्मा के स्िाथा के ऄनुकूल है। िह ऐसे ही कायं को पसन्द करता है। अत्मा की अिाज सुनने िाले और ईसी की अिाज पर चलने िाले सदा पुण्य कमं होते हं। पाप की ओर ईनकी प्रिृित्त ही नहं होती आसिलए िैसे काम ईनसे बन भी नहं पड़ते। अत्मा को तत्कालीन सुख सत्कमं मं अता है। शरीर की मृत्यु होने के ईपरान्त जीि की सद्गित िमलने मं भी हेतु सत्कमा ही हं। लोक और परलोक मं अित्मक सुख शािन्त सत्कमो के उपर ही िनभार है। आसिलए अत्मा का स्िाथा पुण्य प्रयोजन मं है। शरीर का स्िाथा आसके ििपरीत है। आिन्रयाँ और मन संसार के भोगं को ऄिधकािधक मात्रा मं चाहते हं। आस काया प्रणाली को ऄपनाने से मनुष्य नाशिान शरीर की आच्छाएँ पूणा करने मं जीिन को खचा करता है और पापं का भार आकट्ठा करता रहता है। आससे शरीर और मन का ऄिभरं जन तो होता है पर अत्मा को आस लोक और परलोक मं कष्ट ईिाना पड़ता है। अत्मा के स्िाथा के सत्कमं मं शरीर को भी कठिनाआयाँ ईिानी पड़ती हं। तप त्याग संयम ब्रह्म्रचया सेिा दान अकद के कायं मं शरीर को कसा जाता है। तब ये सत्कमा सधते हं। आस प्रकार हम देखते हं कक शरीर के स्िाथा और अत्मा के स्िाथा अपस मं मेल नहं खाते एक के सुख मं दूसरे का दुःख होता है। दोनं के स्िाथा अपस मं एक-दूसरे के ििरोधी हं। आन दो ििरोधी तत्िं मं से हमं एक को चुनना होता है। जो व्यिि ऄपने अपको शरीर समझते हं िे अत्मा के सुख की परिाह नहं करते और शरीर सुख के िलए भौितक सम्पदायं भोग सामिग्रयाँ एकित्रत करने मं ही सारा जीिन व्यतीत करते हं। ऐसे लोगं का जीिन पशुित् पाप रूप िनकृ ष्ट प्रकार का हो जाता है। धमा इश्वर सदाचार परलोक पुण्य परमाथा की चचाा िे भले ही करं

पर यथाथा मं ईनका पुण्य परलोक स्िाथा साधन की ही चारदीिारी के ऄन्दर होता है। यश के िलए ऄपने ऄहंकार को तृप्त करने के िलए दूसरं पर ऄपना िसक्का जमाने के िलए िे धमा का कभी-कभी अश्रय ले लेते हं। िैसे ईनकी मनःिस्थित सदैि शरीर से सम्बन्ध रखने िाले स्िाथा साधनं मं ही िनमग्न रहती है। परन्तु जब मनुष्य अत्मा के स्िाथा को स्िीकार कर लेता है तो ईसकी ऄिस्था ििलक्षण एिं ििपरीत हो जाती है। भोग और ऐश्वया के प्रयत्न ईसे बालकं की िखलिाड़ जैसे प्रतीत होते हं। शरीर जो िास्ति मं अत्मा का एक िस्त्र या औजार मात्र है आतना महत्िपूणा ईसे दृिष्टगोचर नहं होता है कक ईसी के ऐश-अराम मं जीिन जैसे बहुमूल्य तत्ि को बबााद कर कदया जाय। अत्म भाि मं जगा हुअ मनुष्य ऄपने अपको अत्मा मानता है और अत्मकल्याण के अत्म सुख के कायं मं ही ऄिभरुिच रखता और प्रयत्नशील रहता है। ईसे धमा संचय के कायं मं ऄपने समय की एक-एक घड़ी लगाने की लगन लगी रहती है। आस प्रकार शरीर भािी व्यिि ऄपना जीिन पाप की ओर पशुत्ि की ओर चलता है और अत्मभािी व्यिि का प्रिाह पुण्य की ओर देित्ि की ओर प्रिािहत होता है। यह सिा ििकदत है कक आस लोक और परलोक मे पाप का पठरणाम दुखदाइ और पुण्य का पठरणाम सुखदाइ होता है। ऄपने को अत्मा समझने िाले व्यिि सदा अनन्दमयी िस्थित का रसास्िादन करते हं। िजसे अत्मज्ञान हो जाता है िह छोटी घटनाओं से ऄत्यिधक प्रभािित ईत्तेिजत या ऄशान्त नहं होता। लाभ-हािन जीिन-मरण संयोग-िियोग मान-ऄपमान लोभ-मोह क्रोध भोग राग-द्वेष अकद कक कोइ घटना ईसे ऄत्यिधक क्षुिभत नहं करती क्यंकक िह जानता है कक यह सब पठरितानशील संसार मं िनत्य का स्िाभाििक क्रम है। मनोिांिछत िस्तु या िस्थित सदा प्राप्त नहं होती कालचक्र के पठरितान के साथ-साथ ऄिनिच्छत घटनाएँ भी घठटत होती रहती है आसिलए ईन पठरितानं को एक मनोरं जन की तहर नाट्ड रं गमंच की तरह कौतूहल और ििनोद की तरह देखता है। ककसी ऄिनिच्छत िस्थित को सामने अया देखकर िह बेचैन नहं होता। अत्मज्ञानी ईन मानिसक कष्टं से सहज ही बचा रहता है िजससे शरीर भािी लोग सदा व्यिथत और बेचैन रहते हं और कभीकभी तो ऄिधक ईत्तेिजत होकर अत्महत्या जैसे दुखद पठरणाम ईपिस्थत कर लेते हं। जीिन को शुद्ध सरल स्िाभाििक एिं पुण्य-प्रितष्ठा से भरापूरा बनाने का राजमागा यह है कक हम ऄपने अपको शरीर भाि से उँचा ईिािं और अत्मभाि मं जागृत हं। आससे सच्चे सुख-शांित और जीिन लक्ष्य की प्रािप्त होती है अध्यात्म ििद्या के अचायं ने आस तथ्य का भली प्रकार ऄनुभि ककया है और ऄपनी साधनाओं मं सिा प्रथम स्थान अत्मज्ञान को कदया है। मं क्या हूँ आस प्रश्न पर ििचार करने पर यही िनष्कषा िनकलता है कक मं अत्मा हूँ। यह भाि िजतना ही सुदिृ होता जाता है ईतने ही ईसके ििचार और काया अध्याित्मक एिं पुण्य रूप होते जाते हं। अत्मज्ञान हो जाने पर िह सच्चा मागा िमलता है िजस पर चलकर हम जीिन लक्ष्य को परमपद को असानी से प्राप्त कर सकते हं। अत्म स्िरूप को पिहचानने से मनुष्य समझ जाता है कक मं स्थूल शरीर ि सूक्ष्म शरीर नहं हूँ। यह मेरे कपड़े हं। मानिसक चेतनाएँ भी मेरे ईपकरण मात्र हं। आनसे मं बँधा हुअ नहं हूँ। िीक बात को समझते ही सारा भ्रम दूर हो जाता है और बन्दर मुट्ठी का ऄनाज छोड़ देता है। अपने यह ककस्सा सुना होगा कक एक छोटे मुँह के बतान मं ऄनाज जमा था। बन्दर ने ईसे लेने के िलए हाथ्ाा डाला और मुट्ठी मं भरकर ऄनाज िनकालना चाहा। छोटा मुँह होने के कारण िह हाथ िनकाल न सका बेचारा पड़ा-पड़ा चीखता रहा कक ऄनाज ने मेरा हाथ पकड़ िलया है पर ज्ययंही ईसे ऄसिलयत का बोध हुअ कक मंने मुट्ठी बाँध रखी है आसे छोड़ूँ तो सही। जैसे ही ईसने ईसे छोड़ा कक ऄनाज ने बन्दर को छोड़ कदया। काम क्रोधाकद हमं आसिलए सताते हं कक ईनकी दासता हम स्िीकार करते हं। िजस कदन हम ििरोह का झण्डा खड़ा कर दंगे भ्रम ऄपने िबल मं धँस जायगा। भेड़ं मं पला हुअ शेर का बच्चा ऄपने को भेड़ समझता था परन्तु जब ईसने पानी मं ऄपनी तस्िीर देखी तो पाया कक मं भेड़ नहं शेर हूँ। अत्म-स्िरूप का बोध होते ही ईसका सारा भेड़पन क्षणमात्र मं चला गया। अत्मदशान की महत्ता ऐसी ही है िजसने आसे जाना ईसने ईन सब दुःख दाठररयं से छु टकारा पा िलया िजनके मारे िह हर घड़ी हाय-हाय ककया करता था।

जानने योग्य आस संसार मं ऄनेक िस्तुएँ हं पर ईन सबमं प्रधान ऄपने अपको जानना है। िजसने ऄपने को जान िलया ईसने जीिन का रहस्य समझ िलया। भौितक ििज्ञान के ऄन्िेषकं ने ऄनेक अश्चयाजनक अििष्कार ककए हं। प्रकृ ित के ऄन्तराल मं िछपी हुइ ििद्युत शिि इश्वर शिि परमाणु शिि अकद को ढू ँि िनकाला है। ऄध्यात्म जगत के महान ऄन्िेषकं ने जीिन िसन्धु का मन्थन करके अत्मा रूपी ऄमृत ईपलब्ध ककया है। आस अत्मा को जानने िाला सच्चा ज्ञानी हो जाता है और आसे प्राप्त करने िाला ििश्व ििजयी मायातीत कहा जाता है। आसिलए हर व्यिि का कताव्य है कक िह ऄपने अपको जाने। मं क्या हूँ आस प्रश्न को ऄपने अपसे पूछे और ििचार करे िचन्तन तथा मननपूिाक ईसका सही ईत्तर प्राप्त करे । ऄपना िीक रूप मालूम हो जाने पर हम ऄपने िास्तििक िहत-ऄिहत को समझ सकते हं। ििषयानुरागी ऄिस्था मं जीि िजन बातं को लाभ समझता है ईनके िलए लालाियत रहता है िे लाभ अत्मानुरि होने पर तुच्छ एिं हािनकारक प्रतीत होने लगते हं और माया िलप्त जीि िजन बातं से दूर भागता है ईसमं अत्म-परायण को रस अने लगता है। अत्मसाधन के पथ पर ऄग्रसर होने िाले पिथक की भीतरी अँखं खुल जाती हं और िह जीिन के महत्िपूणा रहस्य को समझकर शाश्वत सत्य की ओर तेजी के कदम बिाता चला जाता है। खुमारी ईतारना तो िह है िजस दशा मं मनुष्य ऄपने रूप को भलीभाँित पहचान सके । िजस आलाज से िसिा हाथ-पैर पटकना ही बन्द होता है या अँखं की सुखी ही िमटती है िह पूरा आलाज नहं है। यज्ञ तप दान व्रत ऄनुष्ठान जप अकद साधन लाभप्रद हं आनकी ईपयोिगता से कोइ आन्कार नहं कर सकता। परन्तु यह िास्तििकता नहं है। आससे पिित्रता बिती है सतोगुण की िृिद्घ होती है पुण्य बिता है ककन्तु िह चेतना प्राप्त नहं होता िजसके द्वारा सम्पूणा पदाथं का िास्तििक रूप जाना जा सकता है और सारा भ्रम जंजाल कट जाता है। मुिि के िलए आससे बिकर सरल एिं िनिश्चत मागा हो नहं सकता। िजसने अत्म स्िरूप का ऄनुभि कर िलया सद्गुण ईसके दास हो जाते हं और दुग ा ुणं का पता भी नहं लगता कक िे कहाँ चले गये। अत्म-दशान का यह ऄनुष्ठान उँचा ईिायेगा आस ऄभ्यास के सहारे िे ईस स्थान से उँचे ईि जायंगे जहाँ कक पहले खड़े थे। आस ईच्च िशखर पर खड़े होकर िे देखंगे कक दुिनयाँ बहुत बड़ी है। मेरा राज्यय बहुत दूर तक िै ला हुअ है। िजतनी िचन्ता ऄब तक थी ईससे ऄिधक िचन्ता ऄब मुझे करनी करनी है। िह सोचता है कक मं पहले िजतनी िस्तुओं को देखता था ईससे ऄिधक चीजं मेरी हं। ऄब िह और उँची चोटी पर चिता है कक मेरे पास कहं आससे भी ऄिधक पूँजी तो नहं है जैसे-जैसे उँचा चिता है िैसे ही िैसे ईसे ऄपनी िस्तुएँ ऄिधकािधक प्रतीत होती जाती हं और ऄन्त मं सिोच्च िशखर पर पहुँचकर िह जहाँ तक दृिष्ट िै ला सकता है िहाँ तक ऄपनी ही ऄपनी सब चीजं देखता है। ऄब तक ईसे एक बिहन दो भाइ माँ बाप दो घोडे दस नौकरं के पालन की िचन्ता थी ऄब ईसे हजारं गुने प्रािणयं के पालने की िचन्ता होती है। यही ऄहंभाि का प्रसार है। दूसरे शब्दं मं आसी को ऄहंभाि का नाश कहते हं। बात एक ही है िका िसिा कहने-सुनने का है। रबड़ के गुब्बारे िजसमं हिा भरकर बच्चे खेलते हं तुमने देखे हंगे। आनमं से एक लो और ईसमं हिा भरो। िजतनी हिा भरती जायेगी ईतना ही िह बिता जाएगा और िटने के ऄिधक िनकट पहुँचता जाएगा। कु छ ही देर मं ईसमं आतनी हिा भर जायगी कक िह गुब्बारे को िाड़कर ऄपने ििराट् रूप अकाश मे भरे हुए महान िायुतत्त्ि मं िमल जाय। यही अत्म-दशान प्रणाली है। अत्म-स्िरूप को जानो ईसका ििस्तार करो। बस आतने से ही सूत्र मं िह सब महान ििज्ञान भरा हुअ है िजसके अधार पर िििभन्न ऄघ्यात्म पथ बनाये गये हं। िे सब आस सूत्र मं बीज रूप मं मौजूद हं जो ककसी भी सच्ची साधना से कहं भी और ककसी भी प्रकार हो सकते हं। अत्मा के िास्तििक स्िरूप की एक बार झाँकी कर लेने िाला किर पीछे नहं लौट सकता। प्यास के मारे िजसके प्राण सूख रहे हं ऐसा व्यिि सुरसठर का शीतल कू ल छोड़कर क्या किर ईसी रे िगस्तान मं लौटने की आच्छा करे गा जहाँ प्यास के मारे क्षण-क्षण पर मृत्यु समान ऄसहनीय िेदना ऄब तक ऄनुभि करता रहा है। भगिान कहते हं जहाँ जाकर किर लौटना नहं होता ऐसा मेरा धाम है । सचमुच िहाँ पहुँचने पर पीछे को पाँि पड़ते ही नहं। योग भ्रष्ट हो जाने का िहाँ प्रश्न ही नहं ईिता। घर पहुँच जाने पर भी क्या कोइ घर का रास्ता भूल सकता है

काम क्रोध लोभ मोहाकद ििकार और आिन्रय िासनायं मनुष्य के अनन्द मं बाधक बनकर ईसे दुःखजाल मं डाले हुए हं। पाप और बन्धन ही यह मूल हं। पतन आन्हं के द्वारा होता है और क्रमशः नीच श्रेणी मं आनके द्वारा जीि घसीटा जाता रहता है। िििभन्न ऄध्यात्म पन्थं की ििराट साधनएँ आन्हं दुष्ट शत्रुओं को परािजत करने के चक्रव्यूह हं। ऄजुान रूपी मन को आसी महाभारत मं प्रिृत्त करने का भगिान का ईपदेश है। हम ईस स्थान तक उँचे ईि सकते हं जहाँ सांसाठरक प्रिृित्तयं की पहुँच नहं हो सकती। जब बुराइ न रहेगी तो जो शेष रह जाय िह भलाइ होगी। आस प्रकार अत्मदशान का स्िाभाििक िल दैिी सम्पित्त को प्राप्त करना है। अत्म-स्िरूप का ऄहंभाि का अत्यिन्तक ििस्तार होते-होते रबड़ के थैले के समान बन्धन टू ट जाते हं और अत्मा-परमात्मा मं जा िमलता है। आस भािाथा को जानकर कइ व्यिि िनराश हंगे और कहंग-े यह तो संन्यािसयं का मागा है। जो इश्वर मं लीन होना चाहते हं या परमाथा साधना करना चाहते हं ईनके िलए यह साधन ईपयोगी हो सकता है। आसका लाभ के िल पारलौककक है ककन्तु हमारे जीिन का सारा कायाक्रम आहलौककक है। हमारा जो दैिनक कायाक्रम व्यिसाय नौकरी ज्ञान-सम्पादन रव्य-ईपाजान मनोरं जन अकद का है ईसमं से थोड़ा समय पारलौककक कायं के िलए िनकाल सकते हं परन्तु ऄिधकांश जीिनचयाा हमारी संसाठरक कायं मं िनिहत है। आसिलए ऄपने ऄिधकांश जीिन के कायाक्रम मं हम आसका क्या लाभ ईिा सकं गे ईपरोि शंका स्िाभाििक है क्यंकक हमारी ििचारधारा अज कु छ ऐसी ईलझ गइ है कक लौककक और पारलौककक स्िाथं के दो ििभाग करने पड़ते हं। िास्ति मं ऐसे कोइ दो खण्ड नहं हो सकते जो लौककक है िहं पारलौककक है। दोनं एक-दूसरे से आतने ऄिधक बँधे हुए हं जैसे पेट और पीि। अत्मदशान व्यािहाठरक जीिन को सिल बनाने की सिाश्रेष्ठ कला है। अत्मोन्नित के साथ ही सभी सांसाठरक ईन्नित रहती हं। िजसके पास अत्मबल है ईसके पास सब कु छ है और सारी सिलाताएँ ईसके हाथ के नीचे हं। साधारण और स्िाभाििक योग का सारा रहस्य आसमं िछपा हुअ है कक अदमी अत्म-स्िरूप को जाने ऄपने गौरि को पहचाने ऄपने ऄिधकार की तलाश करे और ऄपने िपता की ऄतुिलत सम्पित्त पर ऄपना हक पेश करे । यह राजमागा है। सीधा सच्चा और िबना जोिखम का है। यह मोटी बात हर ककसी की समझ मं अ जानी चािहए कक ऄपनी शिि और औजारं की कायाक्षमता की जानकारी और ऄज्ञानता ककसी भी काम की सिलता-ऄसिलता के िलए ऄत्यन्त अिश्यक है क्यंकक ईत्तम से ईत्तम बुिद्ध भी तब तक िीक-िीक िै सला नहं कर सकती जब तक ईसे िस्तुओ का स्िरूप िीक तौर से न मालूम हो जाय। तुम तुच्छ नहं महान हो। तुम्हं ककसी ऄशिता का ऄनुभि करना या कु छ माँगना नहं है। तुम ऄनन्त शििशाली हो तुम्हारे बल का पारािार नहं। िजन साधनं को लेकर तुम ऄितीणा हुए हो िे ऄचूक ब्रह्मास्त्र हं। आनकी शिि ऄनेक आन्रिज्रों से ऄिधक है। सिलता और अनन्द तुम्हारा जन्मजात ऄिधकार है। ईिो ऄपने को ऄपने हिथयारं को और काम को भली प्रकार पहचानो और बुिद्धपूिाक जुट जाओ। किर देखं कै से िह चीजं नहं िमलतं िजन्हं तुम चाहते हो। तुम कल्पिृक्ष हो कामधेनु हो सिलता की साक्षात् मूर्तत हो। भय और िनराशा का कण भी तुम्हारी पिित्र रचना मं नहं लगाया गया है। यह लो ऄपना ऄिधकार सँभालो। तुम शरीर नहं हो जीि नहं हो िरन् इश्वर हो। शरीर की मन की िजतनी भी महान् शिियाँ हं िे तुम्हारे औजार हं। आिन्रयं के तुम गुलाम नहं हो अदतं तुम्हं मजबूर नहं कर सकतं मानिसक ििकारं का कोइ ऄिस्तत्ि नहं ऄपने को और ऄपने िस्त्रं को िीक तरह से पहचान लो। किर जीि का स्िाभाििक धमा ईनका िीक ईपयोग करने लगेगा। भ्रमरिहत और तत्िदशी बुिद्ध से हर काम कु शलतापूिाक ककया जा सकता है। यही कमा कौशल योग है। तुम ऐसे ही कु शल योगी बनो। लौककक और पारलौककक कायं मं तुम ऄपना ईिचत स्थान प्राप्त करते हुए सिलता प्राप्त कर सको और िनरन्तर ििकास की ओर बिते चलो यही आस साधन का ईद्देश्य है। 2

आच्छा हुइ होगी कक ईस अत्मा का दशान करना चािहए िजसे देख लेने के बाद और कु छ देखना बाकी नहं रह जाता। यह आच्छा स्िाभाििक है। शरीर और अत्मा का गिबन्धन कु छ ऐसा ही है िजसमं जरा ऄिधक ध्यान से देखने पर िास्तििकता झलक जाती है। शरीर भौितक स्थूल पदाथं से बना हुअ है ककन्तु अत्मा सूक्ष्म है। पानी मं तेल डालने पर िह उपर को ही अने का प्रयत्न करे गा क्यंकक तेल और लक ड़ी के परमाणु पानी की ऄपेक्षा ऄिधक सूक्ष्म हं। गमी उपर को ईिती है ऄिग्न की लपटं उपर को ही ईिं गी। पृथ्िी की अकषाक शिि और िायु का दबाि ईसे रोक नहं सकता है। अत्मा शरीर की ऄपेक्षा सूक्ष्म है आसिलए िह आसमं बंधी हुइ होते हुए भी आसमं पूरी तरह घुल िमल जाने की ऄपेक्षा उपर ईिने की कोिशश करती रहती है। लोग कहते हं कक आिन्रयं के भोग हमं ऄपनी ओर खंचे रहते हं पर यह बात सत्य नहं है। सत्य के दशान कर सकने के योग्य सुििधा और िशक्षा प्राप्त न होने पर झकमारकर ऄपनी अन्तठरक प्यास को बुझाने के िलए मनुष्य ििषय भोगं की कीचड़ पीता है। यकद ईसे एक बार भी अत्मानन्द का चस्का लग जाता तो दर-दर पर क्यं धक्के खाता किरता हम जानते हं कक आन पंिियं को पिते समय तुम्हारा िचत्त िैसी ही ईत्सुकता और प्रसन्नता का ऄनुभि कर रहा है जैसी बहुत कदनं से िबछु ड़ा हुअ परदेशी ऄपने घर कु टुम्ब के समाचार सुनने के िलए अतुर होता है। यह एक मजबूत प्रमाण है िजससे िसद्ध होता है कक मनुष्य की अन्तठरक आच्छा अत्म-स्िरूप देखने की बनी रहती है। शरीर मं रहता हुअ भी िह ईसमं घुलिमल नहं सकता िरन् ईचक-ईचक कर ऄपनी खोइ हुइ ककसी चीज को तलाश करता है। बस िह स्थान जहाँ भटकता है यही है। ईसे यह याद नहं अता कक मं क्या चीज ढू ँढ रहा हूँ मेरा कु छ खो गया है आसका ऄनुभि करता है। खोइ हुइ िस्तु के ऄभाि मं दुःख पाता है ककन्तु माया-जाल के पादे से िछपी हुइ चीज को नहं जान पाता। िचत्त बड़ा चंचल है घड़ी भर भी एक जगह नहं िहरता। आसकी सब लोग िशकायत करते हं परन्तु कारण नहं जानते कक मन आतना चंचल क्यं हो रहा है कस्तूरी मृग कोइ ऄद्भुत गन्ध पाता है और ईसके पास पहँचने के िलए कदन-रात चारं ओर दौड़ता रहता है। क्षण भर भी ईसे ििश्राम नहं िमलता। यही हाल मन का है। यकद िह समझ जाय कक कस्तूरी मेरी नािभ मं रखी हुइ है तो िह ककतना अनन्द प्राप्त कर सके और सारी चंचलता भूल जाय। अत्म-दशान का मतलब ऄपनी सत्ता शरीर और साधनं का िीक-िीक स्िरूप मानस पटल पर आतनी गहराइ के साथ ऄंककत कर लेना है कक िह कदन भर जीिन मे कभी भी भुलाया न जा सके । तोता-रटन्त ििद्या मं तुम बहुत प्रिीण हो सके हो। आसमं िजतना कु छ िलखा है ईससे दस गुना ज्ञान तुम सुना सकते हो आसे बड़े-बड़े तका ईपिस्थत कर सकते हो। शास्त्रीय बारीककयाँ िनकाल सकते हो। परन्तु यह बातं अत्म-मंकदर के िाटक तक ही जाती है आससे अगे आनकी गित नहं है। रट्टू तोता पंिण्डत नहं बन सकता। शास्त्र ने स्पष्ट कर कदया है कक यह अत्मा ईपदेश बुिद्ध या बहुत सुनने से प्राप्त नहं हो सकता। ऄब तक तुम आतना सुन चुके हो िजतना ऄिधकारी भेद के कारण अम लोगं को भ्रम मं डाल देता है। अज हम तुम्हारे साथ कोइ बहस करने ईपिस्थत नहं हुए हं। यकद तुम्हं यह ििषय रुिचकर हो और अत्म-दशान की लालसा हो तो हमारे साथ चले अओ ऄन्यथा ऄपना मूल्यिान समय नष्ट मत करो। अत्म-दशान की सीकियं पर चिने से पहले सिाप्रथम समतल भूिम पर पहँचना होगा। जहाँ अज तुम भटक रहे हो िहाँ से लौट अओ और ईसी भूिम पर िस्थत हो जाओ िजसे प्रिेश द्वार कहते हं। मानलो कक तुमने ऄपने ऄन्य सब ज्ञानं को भुला कदया है और नये िसरे से ककसी पािशाला मं भती होकर क ख ग सीख रहे हो। आसमं ऄपमान मत समझो। तुम्हारा ऄब तक का ज्ञान झुँिा नहं है। तुम ईदूा खूब पिे हो और यकद िहन्दी द्वारा भी लाभ प्राप्त करना चाहो तो एकदम ईसका दशानशास्त्र नहं पिने लगोगे िरन् िणामाला ही से अरं भ करोगे। हम ऄपने अदणीय और ज्ञानी िजज्ञासुओ की पीि थपथपाते हुए दो कदम पीछे लौटने को कहते हं क्यंकक ऐसा करने से प्रथम सीिी पर पाँि रख सके गे और असानी एिं तीव्र गित से उपर चिंगे।

तुम्हं ििचार करना चािहए कक जब मं कहता हूँ कक मं तब ईसका क्या ऄिभप्राय होता है पशु पक्षी तथा ऄन्य ऄििकिसत प्रािणयं मं यह मं की भािना नहं होती। भौितक सुख-दुख का तो िे ऄनुभि करते हं ककन्तु ऄपने बारे मं कु छ ऄिधक नहं सोच सकते। गधा नहं जानता कक मुझ पर ककस कारण बोझ लादा जाता है लादने िाले के साथ मेरा क्या सम्बन्ध है मं ककस प्रकार ऄन्याय का िशकार बनाया जा रहा हूँ िह ऄिधक बोझ लद जाने पर कष्ट का और हरी घास िमल जाने पर शांित का ऄनुभि करता है पर हमारी तरह सोच नहं सकता। आन जीिं मं शरीर ही अत्म-स्िरूप है। क्रमशः ऄपना ििकास करते-करते मनुष्य अगे बि अया है। किर भी ककतने मनुष्य हं जो अत्म-स्िरूप को जानते हं तोता रटन्त दूसरी बात है। लोग अत्म-ज्ञान की कु छ चचाा को सुनकर ईसे मिस्तष्क मं आकाइ की तरह भर लेते हं और समयानुसार ईसमं से कु छ सुना देते हं। ऐसे अदिमयं की कमी नहं जो अत्मा के बारे मं कु छ नहं जानते। आनमं सोचने-ििचारने की शिि चुक गइ है। ईन संसार अहार िनरा भय मैथुन क्रोध लोभ मोह अकद तक ही सीिमत होता है। आन्हं समस्याओं को सोचने समझने और हल करने लायक योग्यता ईन्हंने प्राप्त की होती है। मूि मनुष्य भद्दे भोगं से तृप्त हो जाते हं तो बुिद्घमान कहलाने िाले ईनमं सुन्दरता लाने की कोिशश करते हं। मजदूर को बैलगाड़ी मं बैिकर जाना सौभाग्य प्रतीत होता हं तो धनिान मोटर मं बैिकर ऄपनी बुिद्घमानी पर प्रसन्न होता है। बात एक ही है। बुिद्घ का जो ििकास हुअ है िह भोग सामग्री को ईन्नत बनाने मं हुअ है। समाज के ऄिधकांश सभ्य नागठरकं के िलए िास्ति मं शरीर ही अत्म-स्िरूप है। धार्तमक रूकियं का पालन मन-सन्तोष के िलए िे करते रहते हं पर ईससे अत्म-ज्ञान का कोइ सम्बन्ध नहं। लड़की के िििाह मं दहेज देना पुण्य कमा समझा जाता है। पर ऐसे पुण्य कमं से ही कौन मनुष्य ऄपने ईद्देश्य तक पहुँच सकता है यज्ञ तप ज्ञान सांसाठरक धमा मं लोक-जीिन और समाज-व्यिस्था के िलए ईन्हं करते रहना धमा है । पर आससे अत्मा की प्रािप्त नहं हो सकता। अत्मा आतनी सूक्ष्म है कक रूपया पैसा पूजा- पत्री दान मान अकद बाहरी िस्तुएँ ईस तक नहं पहुँच पातं। किर आनके द्वारा ईसकी प्रािप्त कै से हो सकती है अत्मा के पास तक पहुँचने के साधन जो हमारे पास मौजूद हं िह िचत्त ऄन्तःकरण मन बुिद्घ अकद ही हं। अत्म दशान की साधना आन्हं के द्वारा हो सकती है। शरीर मं सिात्र अत्मा व्याप्त है। कोइ ििशेष स्थान आसके िलए िनयुि नहं है िजस पर ककसी साधन ििशेष का ईपयोग ककया जाय। िजस प्रकार अत्मा की अराधना करने मं मन बुिद्घ अकद ही समथा हो सकते हं ईसी प्रकार ईसके स्थान और स्िरूप का दशान मानस लोक मं प्रिेश करने से हो सकता है। मानिसक लोक भी स्थूल लोक की तरह ही है। ईसमं आसी बाहरी दुिनयाँ की ही ऄिधकांश छाया है। ऄभी हम कलकत्ते का ििचार कर रहे हं ऄभी िहमालय पहाड़ की सैर करने लगे। ऄभी िजनका ििचार ककया था िह स्थूल कलकत्ता और िहमालय नहं थे िरन् मानस लोक मं िस्थत ईनकी छाया थी यह छाया ऄसत्य नहं होती। पदाथं का सच्चा ऄिस्तत्ि हुए िबना कोइ कल्पना नहं हो सकती। आस मानस लोक को भ्रम नहं समझना चािहए। यही िह सूक्ष्म चेतना है िजसकी सहायता से दुिनयाँ के सारे काम चल रहे हं। एक दुकानदार िजसे परदेश से माल खरीदने जाना है िह पहले ईस परदेश की यात्रा मानसलोक मं करता है और मागा की कठिनाआयं को देख लेता है तदनुसार ईन्हं दूर करने का प्रबन्ध करता है। ईच्च अध्याित्मक चेतनाएँ मानसलोक से अती हं। ककसी के मन मं क्या भाि ईपज रहे हं कौन हमारे प्रित क्या सोचता है कौन सम्बन्धी कै से दशा मं है अकद बातं को मानसलोक मं प्रिेश करके हम ऄस्सी िीसदी िीक-िीक जान लेते हं। यह तो साधारण लोगं के काम-काज की मोटी-मोटी बातं हुईं। लोग भििष्य को जान लेते हं भूतकाल का हाल बताते हं परोक्ष ज्ञान रखते हं इश्वरीय सब चेतनाएँ मानस लोक मं ही अती हं। ईन्हं ग्रहण करके जीभ द्वारा प्रगट कर कदया जाता है। यकद यह मानिसक आिन्रयाँ न हुइ होतं तो मनुष्य िबल्कु ल िैसो ही चलता-किरता हुअ पुतला होता जैसी यांित्रक मनुष्य ििज्ञान की सहायता से योरोप और ऄमेठरका मं बनाये गये हं। दस सेर िमट्टी और बीस

सेर पानी के बने हुए आस पुतले की अत्मा और सूक्ष्म जगत से सम्बन्ध जोड़ने िाली चेतना यह मानस-लोक ही समझनी चािहए। मानिसक लोक मं प्रिेश कर चलो और िहाँ बुिद्घ के कदव्य चक्षुओं द्वारा अत्मा का दशान और ऄनुभि करो। तत्ि दशान मानस लोक मं प्रिेश करके बुिद्घ की सहायता द्वारा ही होता है। आसके ऄितठरि अज तक ककसी ने कोइ और मागा ऄभी तक नहं खोज पाया है। प्रत्याहर धारणा ध्यान और समािध ही योग की ईच्च सीकियाँ हं। अध्याित्मक साधक योगी यम िनयम असन प्राणायाम ऄनेक प्रकार की कक्रयायं करते हं। हि योगी नेित धोती ििस्त िज्रोोली अकद करते हं। यह सब शारीठरक कठिनाआयं को दूर करने के िलए हं। शरीर को स्िस्थ रखना आसिलए जरूरी समझा जाता है कक मानिसक ऄभ्यासं मं गड़बड़ न पड़े। हम स्िस्थ शरीर रखने का ईपदेश करते हं। अज की पठरिस्थितयं मं ईन ईग्र शारीठरक व्यायामं की नकल करने मं हमं कोइ ििशेष लाभ प्रतीत नहं होता। धुएँ से भरे हुए शहरी िायुमण्डल मं रहने िाले व्यिि को ईग्र प्राणायाम करने की िशक्षा देना ईसके साथ ऄन्याय करना है। िल और मेिे खाकर पिात प्रदेशीय नकदयं का ऄमृत जल पीने िाले और आिन्द्रय भोगं से दूर रहने िाले हि योग के िजन किोर व्यायामं को करते हं ईनकी नकल करने के िलए यकद तुमसे कहं तो हम एक प्रकार का पाप करं गे और िबना िास्तििकता को जाने ईन शारीठरक तपं मं ईलझने िाले ईस मेढकी का ईदाहरण बनंगे जो घोड़ं को नाल िु किाते देखकर अपे से बाहर हो गइ थी और ऄपने पैरं मं भी िैसी ही कील िु किा कर मर गइ थी। स्िस्थ रहने के साधारण िनयमं को सब लोग जानते हं। ईन्हं ही किोरतापूिाक पालन करना चािहए। यकद कोइ रोग हो तो ककसी कु शल िचककत्सक से आलाज कराना चािहए। आस साधन के िलए ककसी ऐसी शारीठरक योग्यता की अिश्यकता नहं है िजसका साधन िचरकाल मं पूरा हो सकता हो। स्िस्थ रहो प्रसन्न रहो बस आतना ही कािी है। ऄच्छा चलो ऄब साधना की ओर चलं। ककसी एकान्त स्थान की तलाश करो। जहाँ ककसी प्रकार के भय या अकषाण की िस्तुएँ न हं यह स्थान ईत्तम है यद्यिप पूणा एकान्त के अदशा स्थान सदैि प्राप्त नहं होते तथािप जहाँ तक हो सके िनजान और कोलाहल रिहत स्थान तलाश करना चािहए। हम आस काया के िलए िनत नये स्थान बदलने की ऄपेक्षा एक जगह िनयत कर लेना ऄच्छा है। िन पिात नदी तट अकद की सुििधा न हो तो एक छोटा-सा कमरा आसके िलए चुन लो जहाँ तुम्हारा मन जुट जाये। आस तरह बैिो िजससे नािड़यं पर तनाि न पड़े। ऄकड़कर छाती या गरदन िु लाकर हाथं को मरोड़कर या पाँिं को ऐंिकर एक-दूसरे के उपर चिाते हुए बैिने के िलए हम नहं कहंगे क्यंकक आन ऄिस्थाओं मं शरीर को कष्ट होगा और िह ऄपनी पीड़ा की पुकार बार-बार मन तक पहुँचाकर ईसे ईचटने के िलए िििश करे गा। शरीर को िबल्कु ल ढीला िशिथल कर देना चािहए िजससे समस्त मांस पेिशयाँ ढीली हो जािं और देह का प्रत्येक कण िशिथलता शािन्त और ििश्राम का ऄनुभि करे । आस प्रकार बैिने के िलए अराम कु सं बहुत ऄच्छी चीज है। चारपाइ पर लेट जाने से भी काम चल जाता है पर िशर को कु छ उँचा रखना जरूरी है। मसनद कपड़ं की गिरी या दीिार का सहारा लेकर भी बैिा जा सकता है। बैिने का कोइ तरीका क्यं न हो ईसमं यही बात ध्यान रखने की है शरीर रुइ की गिरी जैसा ढीला पड़ जािे ईसे ऄपनी साज सँभाल मं जरा-सा भी प्रयत्र न करना पड़े। ईस दशा मं यकद समािध चेतना अने लागे तब शरीर के आधर-ईधर लुिक पड़ने का भय न रहे। आस प्रकार बैिकर कु छ शरीर को ििश्राम और मन को शािन्त का ऄनुभि करने दो। प्रारिम्भक समय मं यह ऄभ्यास ििशेष प्रयत्र के साथ करना पड़ता है। पीछे ऄभ्यास बि जाने पर तो जब चाहे तब शािन्त का ऄनुभि कर लेता है चाहे िह कहं भी और कै सी भी दशा मं क्यं न हो। सािधान रिहए कक यह दशा तुमने स्िप्न देखने या कल्पना जगत मं चाहे जहाँ ईड़ जाने के िलए पैदा नहं की है और न आसिलए कक आिन्द्रय ििकार आस एकान्त िन मं कबड़्डी खेलने लगं। ध्यान रिखए ऄपनी आस ध्यानािस्था को भी काबू मं रखना और आच्छानुप्रितं बनाना है। यह ऄिस्था आच्छापूिाक ककसी िनिश्चत काया पर लगाने के िलए पैदा की गइ है। अगे चलकर यह बनी रहती है।

तब ईसे ध्यान द्वारा ईत्पन्न नहं करना पड़ता िरन् भय दुख क्लेश अशंका िचन्ता अकद के समय मं िबना यत्न के ही िह जाग पड़ती हं और ऄनायास ही ईन दुःख क्लेशं से बच जाता है। हाँ तो ईपरोि ध्यानािस्था मं होकर ऄपने सम्पूणा ििचारं को मं के उपर आकट्ठा करो। ककसी बाहरी िस्तु या ककसी अदमी के सम्बन्ध मं िबलकु ल ििचार मत करो। भािना करनी चािहए कक मेरी अत्मा यथाथा मं एक स्ितंत्र पदाथा है। िह ऄनन्त बल िाला ऄििनाशी और ऄखण्ड है। िह एक सूया है िजसके -िगदा हमारा संसार बराबर घूम रहा है जैसे सूया के चारं ओर नक्षत्र अकद घूमते हं। ऄपने को के न्र मानना चािहए और सूया जैसा प्रकाशिान। आस भािना को बराबर लगातार ऄपने मानस लोक मं प्रयत्र की कल्पना और रचना शिि के सहारे मानस लोक के अकाश मं ऄपनी अत्मा को सूया रूप मानते हुए के न्र की तरह िस्थत हो जाओ और अत्मा ऄितठरि ऄन्य सब चीजं को नक्षत्र तुल्य घूमती हुइ देखो। िे मुझसे बँधी हुइ हं मं ईनसे बँधा नहं हूँ। ऄपनी शिि से मं ईनका संचालन कर रहा हूँ। किर भी िे िस्तुएँ मेरी या मं नहं हूँ लगातार पठरश्रम के बाद कु छ कदनं मं यह चेतना दृि हो जायगी। िह भािना झूँिी या काल्पिनक नहं है कक ििश्व का हर एक जड़- चेतन परमाणु बराबर घूम रहा है। सूया के अस-पास पृथ्िी अकद ग्रह घूमते हं और समस्त मण्डल एक ऄदृश्य चेतना की पठरक्रमा करता रहती है। हृदयगत चेतना के कारण रि हमारे शरीर की पठरक्रमा करता रहता है। शब्द शिि ििचार या ऄन्य प्रकार के भौितक परमाणुओं का धमा पठरक्रमा करते हुए अगे बिना है। हमारे असपास की प्रकृ ित का यह स्िाभाििक धमा ऄपना काम कर रहा है। हमसे भी िजन परमाणुओं का काम पड़ेगा िह स््भाितः हमारी पठरक्रमा करं गे क्यंकक हम चेतना के के न्र हं। आस िबल्कु ल स्िाभाििक चेतना को भलीभाँित हृदयंगम कर लेने से तुम्हं ऄपने ऄन्दर एक िििचत्र पठरितान मालूम पड़ेगा। ऐसा ऄनुभि होता हुअ प्रतीत होगा कक मं चेतना का के न्र हूँ और मेरा संसार मुझसे सम्बिन्धत समस्त भौितक पदाथा मेरे आदा-िगदा घूमते रहते हं। मकान कपड़े जेिर-धन दौलत अकद मुझसे सम्बिन्धत हं पर िह मुझमं व्याप्त नहं िबल्कु ल ऄलग है। ऄपने को चेतना का के न्र समझने िाला ऄपने को माया से सम्बिन्धत मानता है पर पानी मं पड़े हुए कमल के पत्ते की तरह कु छ उँचा ईिा रहता है ईसमं डू ब नहं जाता। जब िह ऄपने को तुच्छ ऄशि और बँधे हुए जीि की ऄपेक्षा चेतन- सत्ता और प्रकाश-के न्र स्िीकार करता है तो ईसे ईसी के ऄनुसार पठरधान भी िमलते हं। बच्चा जब बड़ा हो जाता है तो ईसके छोटे कपड़े ईतार कदये जाते हं। ऄपने को हीन नीच और शरीरािभमानी तुच्छ जीि जब तक समझोगे तब तक ईसी के लायक कपड़े िमलंगे। लालच भोगेच्छा कामेच्छा चाटु काठरता स्िाथापरता अकद गुण तुम्हं पहनने पड़ंगे पर जब ऄपने स्िरूप को महानतम ऄनुभि करोगे तब यह कपड़े िनरथाक हो जायंगे। छोटा बच्चा कपड़े पर टट्टी कर कर देने मं कु छ बुराइ नहं समझता ककन्तु बड़ा होने पर िह ऐसा करने से घृणा करता है। कदािचत बीमारी की दशा मं िह ऐसा कर भी बैिे तो ऄपने को बड़ा िधक्कारता है और शर्तमन्दा होता है। नीच ििचार हीन भािनाएँ पाशििक आच्छाएँ और क्षुर स्िाथ्पारता ऐसे ही गुण हं िजन्हं देखकर अत्म-चेतना मं ििकिसत हुअ मनुष्य घृणा करता है। ईसे ऄपने अप िह गुण िमल गये होते हं जो ईसके आस शरीर के िलए ईपयुि हं। ईदारता ििशाल हृदयता दया सहानूभूित सच्चाइ प्रभृित गुण ही तब ईसके लायक िीक िस्त्र होते हं। बड़ा होते ही मेढक की लम्बी पूँछ जैसे स्ियमेि झड़ पड़ती है िैसे ही दुग ा ुण ईससे ििदा होने लगते हं और ियोिृद्घ हाथी के दाँत की तरह सद्गुण क्रमशः बिते रहते हं। ऄपने को प्रकाश के न्र ऄनुभि करने के िलए तकरं से काम न चलेगा क्यंकक हमारे तका बहुत ही लंगड़े और ऄन्धे हं। तकं के सहारे यह नहं िसद्घ हो सकता कक िास्ति मं िही हमारा िपता है िजसे िपताजी कहकर सम्बोधन करते हं। आसिलए योगाभ्यास के दैिी ऄनुष्ठान मं आस ऄपािहज तका का बिहष्कार करना पड़ता है और धारणा ध्यान एिं समािध को ऄपनाना पड़ता है। अत्म-स्िरूप के ऄनुभि मं यह तका -िितका बाधक न बनं आसिलए कु छ देर के िलए आन्हं ििदा कर दो। ििश्वास रखो तुम्हं भ्रम मं िँ साने या कोइ गलत हािनकारक साधन बताने नहं जा रहा। िनिश्चत ििश्वास है और

िह शपथपूिाक तुमसे कहता है कक हे ििश्वास रखने िाले यह िीक रास्ता है। देखा हुअ है। अओ पीछे-पीछे चले अओ तुम्हं कहं धके ला नहं जायेगा िरन् एक िीक स्थान पर पहुँचा कदया जायगा। साधन की िििध-- बार-बार ध्यानाििस्थत होकर मानस-लोक मं प्रिेश करो। ऄपने को सूया समान प्रकाशिान सत्ता के रूप मं देखो और ऄपना संसार ऄपने अप-पास घूमता हुअ ऄनुभि करो। आस ऄभ्यास को लगातार जारी रखो और आसे हृदय पट पर गहरा ऄंककत कर लो तथा आस श्रेणी पर पहुँच जाओ कक जब तुम कहो कक मं तब ईसके साथ ही िचत्त मं चेतना ििचार शिि और प्रितभा सिहत के न्र स्िरूप िचत्र भी जाग ईिे । संसार पर जब दृिष्ट डालो तो िह अत्म-सूया की पठरक्रमा करता नजर अिे। ईपरोि अत्म-स्िरूप दशान के साधन मं शीध्रता होने के िलए तुम्हं हम एक और िििध बताते हं। ध्यान की दशा मं होकर ऄपने ही नाम को बार-बार धीरे -धीरे गम्भीरता और आच्छापूिाक जपते जाओ। आस ऄभ्यास से मन अत्म-स्िरूप पर एकाग्र होने लगता है। लाडा टेिनसन ने ऄपनी अत्म-शिि को आसी ईपाय से जगाया था। िे िलखते हं- आसी ईपाय से हमने कु छ अत्म-ज्ञान प्राप्त ककया है। ऄपनी िास्तििकता और ऄमरता को जाना है एिं ऄपनी चेतना के मूल स्रोत का ऄनुभि कर िलया है। कु छ िजज्ञासु अत्म-स्िरूप का ध्यान करते समय मं को शरीर के साथ जोड़कर गलत धारणा कर लेते हं और साधन करने मं गड़बड़ा जाते हं। आस ििघ्न को दूर कर देना अिश्यक है ऄन्यथा आस पंचभूत शरीर को अत्मा समझ बैिने पर तो एक ऄत्यन्त नीच कोठट का थोड़ा सा िल प्राप्त हो सके गा। आस ििघ्न को दूर करने के िलए ध्यानाििस्थत होकर ऐसी भािना करो कक मं शरीर से पृथक् हूँ। ईसका ईपयोग िस्त्र या औजार की तरह करता हूँ। शरीर को िैसा ही समझने की कोिशश करो जैसा पहनने के कपड़े को समझते हो। ऄनुभि करो कक शरीर को त्यागकर भी तुम्हारा मं बना रह सकता है। शरीर को त्यागकर और उँचे स्थान से ईसे देखने की कल्पना करो। शरीर को एक पोले घंसले के रूप मं देखो िजसमं से असानी के साथ तुम बाहर िनकल सकते हो। ऐसा ऄनुभि करो कक आस खोखले को मं ही स्िस्थ बलिान दृि और गितिान बनाये हुए हूँ ईस पर शासन करता हूँ और आच्छानुसार काम मं लाता हूँ। मं शरीर नहं हूँ िह मेरा ईपकरण मात्र है। ईसमं एक मकान की भाँित ििश्राम करता हूँ। देह भौितक परमाणुओं की बनी हुइ है और ईन ऄणुओं को मंने ही आिच्छत िेश के िलए अकर्तषत कर िलया है। ध्यान मं शरीर को पूरी तरह भुला दो और मं पर समस्त भािना एकित्रत करो तब तुम्हं मालूम पड़ेगा कक अत्मा शरीर से िभन्न है। यह ऄनुभि कर लेने के बाद जब तुम मेरा शरीर कहोगे तो पूिा की भाँित नहं िरन् एक नये ही ऄथा मं कहोगे। ईपरोि भािना का तात्पया यह नहं है कक तुम शरीर की ईपेक्षा करने लगो। ऐसा करना तो ऄनथा होगा। शरीर को अत्मा का पिित्र मिन्दर समझो ईसकी सब प्रकार से रक्षा करना और सुदिृ बनाये रखना तुम्हारा परम पािन कताव्य है। शरीर से पृथकत्ि की भािना जब तक साधारण रहती है तब तक तो साधक का मनोरं जन होता है पर जैसे ही िह दृिता को प्राप्त होती है िैसे ही मृत्यु हो जाने जैसा ऄनुभि होने लगता है और िह िस्तुएँ कदखाइ देने लगती हं िजन्हं हम साधना के स्थान पर बैिकर खुली अँखं से नहं देख सकते। सूक्ष्म जगत की कु छ धुँधली झाँकी ईस समय होती है और कोइ परोक्ष बातं एिं दैिी दृश्य कदखाइ देने लगते हं। आस िस्थित मं नये साधक डर जाते हं। ईन्हं समझना चािहए कक आसमं डरने की कोइ बात नहं है। के िल साधन मं कु छ शीघ्रता हो गइ है और पूिा संस्कारं के कारण आस चेतना मं जरा-सा झटका लगते ही िह ऄचानक जाग पड़ी है। आस श्रेणी तक पहुँचने मं जब क्रमशः और धीरे -धीरे ऄभ्यास होता है तो कु छ अश्चया नहं होता। साधना की ईच्च श्रेणी पर पहुँचकर ऄभ्यासी को िह योग्यता प्राप्त हो जाती है कक सचमुच शरीर के दायरे से उपर ईि जाय और ईन िस्तुओं को देखने लगे जो शरीर मं रहते हुए नहं देखी जा सकती थी। ईस दशा मं ऄभ्यासी शरीर से सम्बन्ध तोड़ नहं देता। जैसे कोइ अदमी कमरे की िखड़की मं से गदान बाहर िनकालकर देखता है कक बाहर कहाँ क्या होता है और किर आच्छानुसार

िसर को भीतर कर लेता है यही बात आस दशा मं भी होती है। नये दीिक्षतं को हम ऄभी यह ऄनुभि जागाने की सम्पित नहं देते ऐसा करना क्रम का ईल्लंघन करना होगा। समयानुसार परोक्ष दशान की भी िशक्षा देगे। आस समय तो थोड़ा सा ईल्लेख आसिलए करना पड़ा है कक कदािचत् ककसी को स्ियमेि ऐसी चेतना अने लगे तो ईसे घबराना या डरना न चािहए। जीि के ऄमर होने के िसद्घांत को ऄिधकांश लोग ििश्वास के अधार पर स्िीकार कर लेते हं। ईन्हं यह जानना चािहए कक यह बात कपोल किल्पत िसद्घ हो सकती है। तुम ध्यानािािस्थत होकर ऐसी कल्पना करो कक हम मर गये। कहने-सूनने मं यह बात साधारण सी मालूम देती है। जो साधक िपछले पृष्ठं मं दी हइ लम्बी-चौड़ी भािनाओं का ऄभ्यास करते हं ईनके िलए यह छोटी कल्पना कु छ कठिन प्रतीत न होनी चािहए पर जब तुम आसे करने बैिोगे तो यही कहोगे कक यह नहं हो सकती। ऐसी कल्पना करना ऄसम्भि है। तुम शरीर के मर जाने की कल्पना कर सकते हो पर साथ ही यह पता रहेगा कक तुम्हारा मं नहं मरा है िरन् िह दूर खड़ा हुअ मृत शरीर को देख रहा है। आस प्रकार पता चलेगा कक ककसी भी प्रकार ऄपने मं के मर जाने की कल्पना नहं कर सकते। ििचार बुिद्घ हि करती है कक अत्मा मर नहं सकती। ईसे जीि के ऄमरत्ि्ाा पर पूणा ििश्वास है और चाहे िजतना प्रयत्र ककया जाय िह ऄपने ऄनुभि के त्याग के िलए ईद्यत नहं होगी। कोइ अघात लगकर या क्लोरोिमा सूँघ कर बेहोश हो जाने पर भी मं जागता रहता है। यकद ऐसा न होता तो ईसे जागने पर यह ज्ञान कै से होता कक मं आतनी देर बेहोश पड़ा रहा हूँ बेहोश और िनरा की कल्पना हो सकती है पर जब मं की मृत्यु का प्रश्न अता है तो चारं ओर ऄस्िीकृ त की ही प्रितध्ििन गूँजती है। ककतने हषा की बात है कक जीि ऄपने ऄमर और ऄखण्ड होने का प्रमाण ऄपने ही ऄन्दर दृितापूिाक धारण ककए हुए है। ऄपने को ऄमर ऄखण्ड ऄििनाशी और भौितक संिेदनाओं से परे समझना अत्म-स्िरूप दशान का अिश्यक ऄंग है। आसकी ऄनुभूित हुए िबना सच्चा अत्म-ििश्वास नहं होता और जीि बराबर ऄपनी िचरसेिित तुच्छता की भूिमका मं किसल पड़ता है िजससे ऄभ्यास का सारा प्रयत्र गुड़-गोबर हो जाता है। आसिलए एकाग्रता पूिाक ऄच्छी तरह ऄनुभि करो कक मं ऄििनाशी हूँ। ऄच्छी तरह ईसे ऄनुभि मं लाये िबना अगे मत बिो। जब अगे बिने लगो तब भी कभी-कभी लौटकर ऄपने आस स्िरूप का किर िनरीक्षण कर लो। यह भािना अत्म-स्िरूप के साक्षात्कार मं बड़ी सहायता देगी। ध्यानािस्था मं अत्म-स्िरूप को देह से ऄलग करो और क्रमशः ईसे अकाश हिा ऄिग्न पानी पृथ्िी की परीक्षा मं से िनकलते हुए देखो। कल्पना करो कक मेरी देह की बाधा हट गइ है और ऄब मं स्ितंत्र हो गया हूँ। ऄब तुम अकश मं आच्छापूिाक उँचे-नीचे पखेरुओं की तरह जहाँ चाहे ईड़ सकते हो। हिा के िेग से गित मं कु छ भी बाधा नहं पड़ती और न ईसके द्वारा जीि कु छ सूखता ही है। कल्पना करो कक बड़ी भारी अग की ज्यिाला जल रही है और तुम ईसमं होकर मजे मं िनकल जाते हो और कु छ भी कष्ट नहं होता है। भला जीि को अग कै से जला सकती है ईसकी गमी की पहुँच तो िसिा शरीर तक ही थी। आसी प्रकार पानी और पृथ्िी के भीतर भी जीि की पहुँच िैसे ही है जैसे अकाश मं। ऄथाात् कोइ भी तत्ि तुम्हं छू नहं सकता और तुम्हारी स्ितन्त्रता मं तिनक भी बाधा नहं पहुँच सकता। आस भािना से अत्मा का स्थान शरीर से उँचा ही नहं होता बिल्क ईसको प्रभािित करने िाले पंच-तत्िं से भी उपर ईिता है। जीि देखने लगता है कक मं देह ही नहं िरन् ईसके िनमााता पंच-तत्िं से भी उपर हूँ। ऄनुभि की आस चेतना मं प्रिेश करते ही तुम्हे प्रतीत होगा कक मेरा नया जन्म हुअ है। निीन शिि का संचार ऄपने ऄन्दर होता हुअ प्रतीत होगा और ऐसा भी न होगा कक पुराने िस्त्रं की तरह भय का अिरण उपर से हटा कदया गया है। ऄब ऐसा ििश्वास हो जायगा कक िजन िस्तुओं से मं ऄब तक ही डरा करता था िे मुझे कु छ भी हािन नहं पहुँचा सकतं। शरीर तक ही ईनकी गित है। सो ज्ञान और आच्छा शिि द्वारा शरीर से भी आन भयं को दूर हटाया जा सकता है।

बार-बार समझ लो। प्राथिमक िशक्षा का बीज मंत्र मं है। आसका पूरा ऄनुभि करने के बाद ही ऄध्याित्मक ईन्नित के पथ पर ऄग्रसर हो सकोगे। तुम्हं ऄनुभि करना होगा मेरी सत्ता शरीर से िभन्न है। ऄपने को सूया के समान शिि का एक महान् के न्र देखना होगा िजसके आदा-िगदा ऄपना संसार घूम रहा है। आससे निीन शिि अिेगी िजसे तुम्हारे साथी प्रत्यक्ष ऄनुभि करं गे। तुम स्ियं स्िीकार करोगे ऄब मं सुदिृ हूँ और जीिन की अँिधयाँ मुझे ििचिलत नहं कर सकतं। के िल आतना ही नहं आससे भी अगे है। ऄपनी ईन्नित के अित्मक ििकास के साथ ईस योग्यता को प्राप्त करता हुअ भी देखोगे िजसके द्वारा जीिन की अँिधयं को शान्त ककया जाता है और ईन पर शासन ककया जाता है। अत्म-ज्ञानी दुिनयाँ के भारी कष्टं की दशा मं भी हँसता रहेगा और ऄपनी भुजा ईिाकर कष्टं से कहेगा- जाओ चले जाओ िजस ऄन्धकार से तुम ईत्पन्न हुए हो ईसी मं ििलीन हो जाओ । धन्य है िह िजसने मं के बीज मंत्र को िसद्घ कर िलया है। प्रथम िशक्षा का ऄभ्यास करने के िलए ऄपनी मन्द-गित देखो तो ईतािले मत होओ। अगे चलने मं यकद पाँि पीछे किसल पड़े तो िनराश मत होओ। अगे चलकर तुम्हं दूना लाभ िमल जायगा। िसिद्घ और सिलता तुम्हारे िलए है िह तो प्राप्त होनी ही है। बिो शांित के साथ थोड़ा प्रयत्र करो। - मं प्रितभा और शिि का के न्र हूँ। - मं ििचार और शिि का के न्र हूँ। - मेरा संसार मेरे चारं ओर घूम रहा है। - मं शरीर से िभन्न हूँ। - मं ऄििनाशी हूँ मेरा नाश नहं हो सकता। - मं ऄखण्ड हूँ मेरी क्षित नहं हो सकती।

3 शरीर से आिन्रयाँ परे सूक्ष्म हं। आिन्रयं से परे मन है और मन से परे अत्मा है। अत्मा तक पहुँचने के िलए क्रमशः सीकियाँ चिनी हंगी। िपछले ऄत्याम मं अत्मा को शरीर और आिन्रयं से उपर ऄनुभि करने के साधन बताये गये थे। प्राचीन दशानशास्त्र मन और बुिद्घ को ऄलग-ऄलग िगनता है। अधुिनक दशानशास्त्र मन को ही सिोच्च श्रेणी की बुिद्घ मानता है। आस बहस मं अपको कोइ खास कदलचस्पी लेने की अिश्यकता नहं है। दोनं का मतभेद आतना बारीक है कक मोटी िनगाह से िह कु छ भी प्रतीत नहं होता। दोनं ही मन तथा बुिद्घ को मानते हं। दोनं ही स्थूल मन से बुिद्घ को सूक्ष्म मानते हं। हम बुिद्घ को मन की ही ईन्नत कोठट मं िगन लंगे और अगे का ऄभ्यास अरम्भ करं गे। ऄब तक यह पहचाना है कक हमारे भौितक अिरण क्या हं ऄसली ऄहम् मं से ककतना परे है। िह सूक्ष्म परीक्षण है। भौितक अिरणं का ऄनुभि िजतनी असानी से हो जाता है ईतना सूक्ष्म शरीर मं से ऄपने िास्तििक ऄहम् को पृथक कर सकना असान नहं है। आसके िलए कु छ ऄिधक योग्यता और उँची चेतना होनी चािहए। भौितक पदाथं से पृथकता का ऄनुभि हो जाने पर भी ऄहम् के साथ िलपटा हुअ सूक्ष्म शरीर गड़बड़ मं डाल देता है। बहुत से लोग मन को ही अत्मा समझने लगे हं। अगे हम मन के रूप की व्याख्या न करं गे पर ऐसे ईपाय बतािंगे िजससे स्थूल शरीर और भद्दे मं के टु कड़े-टु कड़े कर सको और ईनमं से तलाश कर सको कक आनमं ऄहम् कौन-सा है और ईनसे िभन्न िस्तुएँ कौन-सी हं आस ििश्लेषण को तुम मन के द्वारा कर सकते हो और ईसे आसके िलए मजबूर कर सकते हो कक आन प्रश्नं का सही ईत्तर दे। शरीर और अत्मा के बीच की चेतना मन है। साधनं की सुििधा के िलए मन को तीन भागं मं बाँटा जाता है। मन के पिहले भाग का नाम प्रिृत्त मानस है। यह पशु-पक्षी अकद ऄििकिसत जीिं और मनुष्यं मं समान रूप से पाया जाता है। गुप्त मन और सुप्त मानस भी ईसे कहते हं। शरीर को स्िाभाििक और जीिन्त बनाये रखना आसी के हाथ मं है। हमारी जानकारी के िबना भी शरीर का

व्यापार ऄपने अप चलता रहता है। भोजन की पाचन कक्रया रि का घूमना क्रमशः रस रि मांस मेदा ऄिस्थ िीया का बनना मल त्याग श्वास-प्रश्वास पलकं खुलना बन्द होना अकद काया ऄपने अप होते रहते हं। अदतं पड़ जाने का काया आसी मन के द्वारा होता है। यह मन देर मं ककसी बात को ग्रहण करता है पर िजसे ग्रहण कर लेता है ईसे असानी से छोड़ता नहं। हमारे पूिाजं के ऄनुभि और हमारे िे ऄनुभि जो पाशििक जीिन से ईिकर आस ऄिस्था मं अने तक प्राप्त हुए हं आसी मं जमा हं। मनुष्य एक ऄल्प बुिद्घ साधारण प्राणी था। ईस समय की इष्र्या द्वेष युद्घ- प्रिृित्त स्िाथा िचन्ता अकद साधारण िृित्तयाँ आसी के एक कोने मं पड़ी रहती हं। िपछले ऄनेक जन्मं के नीच स्िभाि िजन्हं प्रबल प्रयत्रं द्वारा काटा नहं गया है आसी ििभाग मं आकट्ठे रहते हं। यह एक ऄद्भुत ऄजायबघर है िजसमं सभी तरह की चीजं जमा हं। कु छ ऄच्छी और बहुमूल्य हं तो कु छ सड़ी-गली भद्दी तथा भयानक भी हं। जंगली मनुष्यं पशुओं तथा दुष्टं मं जो लोभ हिहसा क्रूरता अिेश ऄधीरता अकद िृित्तयाँ होती हं िह भी सूक्ष्म रूपं मं आसमं जमा हं। यह बात दूसरी है कक कहं ईच्च मन द्वारा पूरी तरह से िे िश मं रखी जाती हं कहं कम। राजस और तामसी लालसायं आसी मन से सम्बन्ध रखती हं। आिन्रयं के भोग घमण्ड क्रोध भूख मैथुनेच्छा िनरा अकद प्रिृत्त मानस के रूप है। प्रिृत्त मन से उपर दूसरा मन है िजसे प्रबुद्ध मानस कहना चािहए। आसको पिते समय तुम ईसी मन का ईपयोग कर रहे हो। आसका काम सोचना ििचारना िििेचना करना तुलना करना कल्पना तका तथा िनणाय अकद करना है। बुिद्घमत्ता चतुरता ऄनुभि िस्थित का परीक्षण यह सब प्रबुद्घ मन द्वारा होते हं। याद रखो जैसे प्रिृत्त मानस ऄहम् नहं है ईसी प्रकार प्रबुद्घ मानस भी िह नहं है। कु छ देर ििचार करके तुम आसे असानी के साथ ऄहम् से ऄलग कर सकते हो। तुम ऄनुभि कर लो कक प्रबुद्घ मन भी एक अच्छादन है न कक ऄहम् । तीसरे सिोच्च मन का नाम ऄध्यात्म मानस है। आसका ििकास ऄिधकांश लोगं मं नहं हुअ होता। मेरा ििचार है कक तुम मं यह कु छ-कु छ ििकसने लगा है क्यंकक आसको मन लगाकर पि रहे हो और आसमं िर्तणत ििषय की ओर अकर्तषत हो रहे हो। मन के आस ििभाग को हम लोग ईच्चतम ििभाग मानते हं और अध्याित्मकता अत्म-प्रेरणा इश्वरीय सन्देश प्रितभा अकद के रूप मं जानते हं। ईच्च भािनाएँ मन के आसी भाग मं ईत्पन्न होकर चेतना मं गित करती हं। प्रेम सहानुभूित दया करुणा न्याय िनष्ठा ईदारता धमा प्रिृित्त सत्य पिित्रता अत्मीयता अकद सब भािनाएँ आसी मन से अती हं। इश्वरीय भिि आसी मन मं ईदय होती है। गूि तत्िं का रहस्य आसी के द्वारा जाना जाता है। आस पाि मं िजस ििशुद्घ ऄहम् की ऄनुभूित के िशक्षण का हम प्रयत्र कर रहे हं िह आसी ऄध्यात्म मानस के चेतना क्षेत्र से प्राप्त हो सके गी। परन्तु भूिलए मत मन का यह सिोच्च भाग भी के िल ईपकरण ही है। ऄहम् यह भी नहं है। तुम्हं यह भ्रम न करना चािहए कक हम ककसी मन की िनन्दा और ककसी की स्तुित करते हं और भार या बाधक िसद्घ करते हं। बात ऐसी नहं है। सब सोचते तो यह हं कक मन की सहायता से ही तुम ऄपनी िास्तििक सत्ता और अत्म-ज्ञान के िनकट पहुँचे हो और अगे भी बहुत दूर तक ईसकी सहायता से ऄपना मानिसक ििकास कर सकोगे आसिलए मन का प्रत्येक ििभाग ऄपने स्थान पर बहुत ऄच्छा है बश्रते कक ईसका िीक ईपयोग ककया जाय। साधारण लोग ऄब तक मन के िनम्न भागं को ही ईपयोग मं लाते हं ईनके मानस-लोक मं ऄभी ऐसे ऄसंख्य गुप्त प्रकट स्थान हं िजनकी स्िप्र मं भी कल्पना नहं की जा सकी है ऄतएि मन को कोसने के स्थान पर अचाया लोग दीिक्षतं को सदैि यह ईपदेश देते हं कक ईस गुप्त शिि को त्याज्यय न िहराकर िीक प्रकार से कक्रयाशील बनाओ। यह िशक्षा जो तुम्हं दी जा रही है मन के द्वारा ही कक्रया रूप मं अ सकती है और ईसी के द्वारा समझने धारण करने एिं सिल होने का काया हो सकता है आसिलए हम सीधे तुम्हारे मन से बात कर रहे हं ईसी से िनिेदन कर रहे हं कक महोदय ऄपनी ईच्च कक्षा से अने िाले ज्ञान को ग्रहण कीिजए और ईसके िलए ऄपना द्वार खोल दीिजए। हम अपकी बुिद्घ से प्राथाना करते हं-भगिती

ऄपना ध्यान ईस माहात्म्य की ओर लगाआए और सत्य के ऄनुभिी ऄपने अध्याित्मक मन द्वारा अने िाली दैिी चेतनाओं मं कम बाधा दीिजए। ऄभ्यास--- सुख और शािन्तपूिाक िस्थत होकर अदर के साथ ईस ज्ञान को प्राप्त करने के िलए बैिो जो ईच्च मन की ईच्च कक्षा द्वारा तुम्हं प्राप्त होने को है। िपछले पाि मं तुमने समझा था कक मं शरीर से परे कोइ मानिसक चीज है िजसमं ििचार भािना और िृित्तयाँ भरी हुइ हं। ऄब आससे अगे बिना होगा और ऄनुभि करना होगा कक यह ििचारणीय िस्तुएँ अत्मा से िभन्न हं। ििचार करो कक द्वेष क्रोध ममता इष्र्या घृणा ईन्नित अकद की ऄसंख्य भािनाएँ मिस्तक मं अती रहती हं। ईनमं से हर एक को तुम ऄलग का सकते हो जाँच कर सकते हो ििचार कर सकते हो खिण्डत कर सकते हो ईनके ईदय िेग और ऄन्त को भी जान सकते हो। कु छ कदन के ऄभ्यास से ऄपने ििचारं की परीक्षा करने का ऐसा ऄभ्यास प्राप्त कर लोगे मानो ऄपने ककसी दूसरे िमत्र की भािनाओं के ईदय िेग और ऄन्त का परीक्षण कर रहे हो। यह सब भािनायं तुम्हारे िचन्तन के न्र मं िमलंगी। ईनके स्िरूप का ऄनुभि कर सकते हो और ईन्हं टटोल तथा िहला-डु लाकर देख सकते हो। ऄनुभि करो कक यह भािनाएँ तुम नहं हो। ऄब ईन्हं त्यागकर अत्म स्िरूप की कल्पना करो। ऐसी भािना सरलता पूिाक कर सकोगे। ईन मानिसक िस्तुओं को पृथक करके तुम ईन पर ििचार कर रहे हो आसी से िसद्घ होता है कक िह िस्तुएँ तुम से पृथक हं। पृथकत्ि की भािना ऄभ्यास द्वारा थोड़े समय बाद लगातार बिती जायगी और शीध्र ही एक महान अकार मं प्रकट होगी। यह मत सोिचए कक हम आस िशक्षा द्वारा यह बता रहे हं कक भािनाएँ कै से त्याग करं । यकद तुम आसी िशक्षा की सहायता से दुष्प्रिृित्तयं को त्याग सकने की क्षमता प्राप्त कर सको तो बहुत प्रसन्ता की बात् है पर हमारा यह मन्तव्य नहं है हम आस समय तो यही सलाह देना चाहते हं कक ऄपनी बुरी-भली सब दुष्प्रिृित्तयं को जहाँ की तहाँ रहने दो और ऐसा ऄनुभि करो कक- ऄहम् आन सबसे परे एिं स्ितंत्र है। जब तुम ऄहम् के महान् स्िरूप का ऄनुभि कर लो तब लौट अऄाो और ईन िृित्तयं को जो ऄब तक तुम्हं ऄपनी चाकर बनाये हुए थं मािलक की भाँित ईिचत ईपयोग मं लाओ ऄपनी िृित्तयं को ऄहम् से परे के ऄनुभि मं पटकते समय डरो मत। ऄभ्यास समाप्त करने के बाद किर िापस लौट अओगे और ईनमं से ऄच्छी िृित्तयं को आच्छानुसार काम मं ला सकोगे। ऄमुक िृित्त ने मुझे ऄिधक बाँध िलया है ईससे कै से छू ट सकता हूँ आस प्रकार की िचन्ता मत करो। यह चीजं बाहर की हं। आसके बंधन मं बँधने से पहले ऄहम् था और बाद मं भी बना रहेगा जब ऄपने को पृथक् करके ईनका परीक्षण कर सकते हो तो क्या कारण है कक एक ही झटके मं ईिाकर ऄलग नहं िं क सकोगे ध्यान देने योग्य बात यह है कक तुम आस बात का ऄनुभि और ििश्वास कर रहे हो कक मं बुिद्घ और आन शिियं का ईपभोग कर रहा हूँ। यही मं जो शिियं को ईपकरण मानता हं मन का स्िामी ऄहम्' है। ईच्च अध्याित्मक मन से अइ प्रेरणा भी आसी प्रकार ऄध्ययन की जा सकती है आसिलए ईन्हं भी ऄहम् से िभन्न माना जायगा। अप शंका करं गे कक ईच्च अध्याित्मक प्रेरणा का ईपयोग ईस प्रकार नहं ककया जा सकता आसिलए सम्भि है िे प्रेरणायं ऄहम् िस्तुएँ हं अज हमं तुमसे आस ििषय पर कोइ िििाद नहं करना है क्यंकक तुम अध्याित्मक मन की थोड़ी बहुत जानकारी को छोड़कर ऄभी आसके सम्बन्ध मं और कु छ नहं जानते। साधारण मन के मुकािबले मं िह मन इश्वरीय भूिमका के समान है। िजन तत्िदर्तशयं ने ऄहम् ज्ययोित का साक्षात्कार ककया है और जो ििकास ही ईच्च ऄत्युच्च सीमा तक पहुँच गये हं िे योगी बतलाते हं कक ऄहम् अध्याित्मक मन से उपर रहता है और ईसको ऄपनी ज्ययोित से प्रकािशत करता है जैसे पानी पर पड़ता हुअ सूया का प्रितिबम्ब सूया जैसा ही मालूम पड़ता है। परन्तु िसद्घं का ऄनुभि है कक िह के िल धुँधली तस्िीर मात्र है। चमकता हुअ अध्याित्मक मन यकद प्रकाशिबम्ब है तो ऄहम् ऄखण्ड ज्ययोित है ईस ईच्च मन मं होता हुअ अित्मक प्रकाश पाता है आसी से िह ऄध्याित्मक मन आतना प्रकाशमय प्रतीत होता है। ऐसी दशा मं ईसे ही ऄहम् मान लेने का भ्रम हो जाता है। ऄसल मं िह भी ऄहम् है नहं। ऄहम् ईस प्रकाश मिण के समान है जो स्ियं

सदैि समान रूप से प्रकािशत रहती है ककन्तु कपड़ं से ढकी रहने के कारण ऄपना प्रकाश बाहर लाने मं ऄसमथा होती है। ये कपड़ेजैस-े जैसे हटते जाते हं िैसे ही िैसे प्रकाश ऄिधक स्पष्ट होता जाता है। किर भी कपड़ं के हटने या ईनके और ऄिधक मात्रा मं पड़ जाने के कारण मिण के स्िरूप मं कोइ पठरितान नहं होता। आस चेतना मं ले जाने का आतना ही ऄिभप्राय है कक ऄहम् की सिोच्च भािना मं जागकर तुम एक समुन्नत अत्मा बन जाओ और ऄपने ईपकरणं का िीक ईपयोग करने लगो। जो पुराने ऄनािश्यक रद्दी और हािनकर पठरधान हं ईन्हं ईताकर िं क सको और निीन एिं ऄद्भुत कक्रयाशील औजारं को ईिाकर ईनके द्वारा ऄपने सामने के कायं को सुन्दरता और सुगमता के साथ पूरा कर सको ऄपने को सिल एिं ििजयी घोिषत कर सको। आतना ऄभ्यास और ऄनुभि कर लेने के बाद तुम पूछोगे कक ऄब क्या बचा िजसे ऄहम् से िभन्न न िगनं आसके ईत्तर मं हमं कहना है कक ििशुद्घ अत्मा। आसका प्रमाण यह है कक ऄपने ऄहम् को शरीर मन अकद ऄपनी सब िस्तुओं से पृथक करने का प्रयत्न करो। छोटी चीजं से लेकर ईससे सूक्ष्म ईससे सूक्ष्म ईससे परे से परे िस्तुओं को छोड़ते-छोड़ते िशुद्घ अत्मा तक पहुँच जाओगे। क्या ऄब आससे भी परे कु छ हो सकता है कु छ नहं। ििचार करने िाला-परीक्षा करने िाला और परीक्षा की िस्तु दोनं एक िस्तु नहं हो सकते। सूया ऄपनी ककरणं द्वारा ऄपने ही उपर नहं चमक सकता। तुम ििचार और जाँच की िस्तु नहं हो। किर भी तुम्हारी चेतना कहती है मं हूँ। यही अत्मा के ऄिस्तत्ि का प्रमाण है। ऄपनी कल्पना शिि स्ितन्त्रता शिि लेकर आस ऄहम् को पृथक करने का प्रयत्र कर लीिजए परन्तु किर भी हार जाओगे और ईससे अगे नहं बि सकोगे। ऄपने को मरा हुअ नहं मान सकते। यही ििशुद्घ अत्मा ऄििनाशी ऄििकारी इश्वरीय समुर की िबन्दु परमात्मा की ककरण है। ऄपनी अत्मा का ऄनुभि प्राप्त करने मं सिल होओ और समझो कक तुम सोते हुए देिता हो। ऄपने भीतर प्रकृ ित की महान सत्ता धारण ककए हुए हो जो कायारूप मं पठरणत होने के िलए हाथ बाँधकर खड़ी हुइ अज्ञा माँग रही है। आस स्थान तक पहुँचने मं बहुत कु छ समय लगेगा। पहली मंिजल तक पहुँचने मं भी कु छ देर लगेगी परन्तु अध्याित्मक ििकास की चेतना मं प्रिेश करते ही अँखं खुल जायंगी। अगे का प्रत्येक कदम साि होता जायेगा और प्रकाश प्रकट होता जायेगा। अपकी ििशुद्घ अत्मा भी स्ितंत्र नहं िरन् परमात्मा का ही एक ऄंश है और ईसी मं ककस प्रकार ओत-प्रोत रही है परन्तु ईस ज्ञान को ग्रहण करने से पूिा तुम्हं ऄपने भीतर ऄहम् की चेतना जगा लेनी पडेगी। हमारी आस िशक्षा को शब्द-शब्द और के िल शब्द समझकर ईपेिक्षत मत करो आस िनबाल व्याख्या को तुच्छ समझकर ितरस्कृ त मत करो यह एक बहुत सच्ची बात बताइ जा रही है। तुम्हारी अत्मा आन पंिियं को पिते समय अध्याित्मक ज्ञान की प्रािप्त के मागा पर ऄग्रसर होने की ऄिभलाषा कर रही है। ईसका नेतृत्ि ग्रहण करो और अगे को कदम ईिाओ। ऄब तक बताइ हुइ मानिसक कसरतं का ऄभ्यास कर लेने के बाद ऄहम् से िभन्न पदाथं का तुम्हं पूरा िनश्चय हो जायगा। आस सत्य को ग्रहण कर लेने के बाद ऄपने को मन और िृित्तयं का स्िामी ऄनुभि करोगे और तब ईन सब चीजं को पूरे बल और प्रभाि के साथ काम मं लाने की सामाथ्य प्राप्त कर लोगे। आस महान तत्ि की व्याख्या मं यह ििचार और शब्दािली हीन िशिथल और सस्ते प्रतीत होते हंगे। यह ििषय ऄिनिाचनीय है। िाणी की गित िहाँ तक नहं है। गुड़ का िमिास जबानी जमा खचा द्वारा नहं समझाया जा सकता। हमारा प्रयत्न के िल आतना ही है कक तुम ध्यान और कदलचस्पी की तरि झुक पड़ो और आन कु छ मानिसक कसरतं को करने के ऄभ्यास मं लग जाओ। ऐसा करने से मन िास्तििकता का प्रमाण पाता जायेगा और अत्म-स्िरूप मं दृिता होती जायेगी। जब तक स्ियं ऄनुभि न हो जाय तब तक ज्ञान ज्ञान नहं है। एक बार जब तुम्हे ईस सत्य के दशान हो जायंगे तो िह किर दृिष्ट से ओझल नहं हो सके गा और कोइ िाद-िििाद ईस पर ऄििश्वास नहं करा सके गा। ऄब तुम्हं ऄपने को दास नहं स्िामी मानना पड़ेगा। तुम शासक हो और मन अज्ञा-पालक। मन द्वारा जो ऄत्याचार ऄब तक तुम्हारे उपर हो रहे थे ईन सबको िड़िड़ाकर िं क दो और ऄपने को ईनसे मुि हुअ समझो। तुम्हं अज राज्यय हिसहासन संपा जा रहा है ऄपने को राजा ऄनुभि करो।

दृितापूिाक अज्ञा दो कक स्िभाि ििचार संकल्प बुिद्ध कामनाएँ समस्त कमाचारी शासन को स्िीकर करं और नये सिन्ध-पत्र पर दस्तखत करं कक हम ििादार नौकर की तरह ऄपने राजा की अज्ञा मानंगे और राज्यय-प्रबन्ध को सिोच्च एिं सुन्दरतम बनाने मं रत्ती भर भी प्रमाद न करं ग।े लोग समझते हं कक मन ने हमं ऐसी िस्थित मं डाल कदया है कक हमारी िृित्तयां हमं बुरी तरह काँटं मं घसीटे किरती हं और तरह-तरह से त्रास देकर दुखी बनाती हंाै। साधक आन दुखं से छु टकारा पा जािंगे क्योकक िह ईन सब ईद्गमं से पठरिचत हं और यहाँ काबू पाने की योग्यता सम्पादन कर चुके हं। ककसी बड़े िमल मं सैकड़ो घोड़ं की ताकत से चलने िाला आं जन और ईसके द्वारा संचािलत होने िाली सैकड़ं मशीनं तथा-ईनके ऄसंख्य कल-पुाजे ककसी ऄनाड़ी को डरा दंगे। िह ईस घर मं घुसते ही हड़बड़ा जायगा। ककसी पूाजे मं धोती िँ स गइ तो ईसे छु टाने मं ऄसमथा होगा और ऄज्ञान के कारण बड़ा त्रास पािेगा। ककन्तु िह आँ जीिनयर जो मशीनं के पुाज-े पुाजे से पठरिचत है और आं जन चलाने के सारे िसद्धान्त को भली भाँित समझा हुअ है ईस कारखाने मं घुसते हुए तिनक भी न घबरायेगा और गिा के साथ ईन दैत्याकार यन्त्रं पर शासन करता रहेगा जैसे एक महाित हाथी पर और सपेरा भयंकर ििषधरं पर करता है। ईसे आतने बड़े यंत्रालय का ईत्तरदाियत्ि लेते हुए भय नहं ऄिभमान होगा। िह हषा और प्रसन्नतापूिाक शाम को िमल मािलक को िहसाब देगा बकिया माल की आतनी बड़ी रािश ईसने थोड़े समय मे ही तैयार कर दी है। ईसकी िू ली हुइ छाती पर से सिलता का गिा मानो टपका पड़ रहा है। िजसने ऄपने ऄहम् और िृित्तयं का िीक-िीक स्िरूप और सम्बन्ध जान िलया है िह ऐसा ही कु शल आं जीिनयर यंत्र संचालक है। ऄिधक कदनं का ऄभ्यास और भी ऄद्भुत शिि देता है। जागृत मन ही नहं ईस समय प्रिृत्त मन गुप्त मानस भी िशिक्षत हो गया होता है और िह जो अज्ञा प्राप्त करता है ईसे पूरा करने के िलए चुपचाप तब भी काम ककया करता है जब लोग दूसरे कामं मे लगे होते हं या सोये होते हं। गुप्त मन जब ईन कायं को पूरा सामने रखता है तब नया साधक चंकता है कक यह ऄदृष्ट सहायता है यह ऄलौककक करामात है परन्तु योगी ईन्हं समझाता है कक िह तुम्हारी ऄपनी ऄपठरिचत योग्यता है आससे ऄसंख्य गुनी प्रितभा तो ऄभी तुम मं सोइ पड़ी है। संतोष और धैया धारण करो काया कठिन है पर आसके द्वारा जो पुरस्कार िमलता है ईसका लाभ बड़ा भारी है। यकद िषं के कठिन ऄभ्यास् और मनन द्वारा भी तुम ऄपने पद सत्ता महत्ि गौरि शिि की चेतना प्राप्त कर सको तब भी िह करना ही चािहए। यकद तुम आन ििचारं मं हमसे सहमत हो तो के िल पिकर ही संतुष्ट मत हो जाओ। ऄध्ययन करो मनन करो अशा करो साहस करो और सािधानी तथा गम्भीरता के साथ आस साधन-पथ की ओर चल पड़ो। - मं सत्ता हूँ। मन मेरे प्रकट होने का ईपकरण है - मं मन से िभन्न हूँ। ईसकी सत्ता पर अिश्रत नहं हूँ। - मं मन का सेिक नहं शासक हूँ। - मं बुिद्ध स्िभाि आच्छा और ऄन्य समस्त मानिसक ईपकरणं को ऄपने से ऄलग कर सकता हूँ। तब जो कु छ शेष रह जाता है िह मं हूँ। - मं ऄजर-ऄमर ऄििकारी और एक रस हूँ। - मं हूँ।

संसार मं िजतना भी कु छ है िह सब इश्वर से ओत-प्रोत है। अत्म-स्िरूप और ईसके अिरणो से िजज्ञासुओं का पठरिचत कराने का प्रयत्न ककया गया है। आस ऄध्याय मं अत्मा और परमात्मा का सम्बन्ध बताने का प्रयत्न ककया जायेगा। ऄब तक िजज्ञासु ऄहम् का जो रूप समझ सके हं िास्ति मं िह ईससे कहं ऄिधक है। परमेश्वर का ही िह ऄंश है। तत्ितः ईसमं कोइ िभन्नता नहं है।

तुम्हं ऄब आस तरह ऄनुभि करना चािहए कक मं ऄब तक ऄपने को िजतना समझता हूँ ईससे कइ गुना बड़ा हूं। ऄहम् की सीमा समस्त ब्रह्माण्ड के छोर तक पहुँचती है। िह परमात्म शिि की सत्ता मं समाया हुअ है और ईसी से आस प्रकार पोषण ले रहा है जैसे गभास्थ बालक ऄपनी माता के शरीर से। िह परमात्मा का िनज तत्ि है। तुम्हं अत्मा परमात्मा की एकता का ऄनुभि करना होगा और क्रमशः ऄपनी ऄहन्ता को बिाकर ऄत्यन्त महान् कर देने को ऄभ्यास मं लाना होगा। तब ईस चेतना मं जग सकोगे जहाँ पहुँच कर योग के अचाया कहते हं सोहम् । ऄपने चारं ओर दूर तक नजर िै लाओ और ऄन्तर नेत्रं से िजतनी दूरी तक के पदाथं को देख सकते हो देखो प्रतीत होगा कक एक महान् ििश्व चारो ओर बहुत दूर बहुत दूर तक िै ला हुअ है। यह ििश्व के िल ऐसा ही नहं है जैसा मोटे तौर पर समझा जाता है िरन् यह एक चेतना का समुर है। प्रत्येक परमाणु अकाश एिं इथर तत्ि मं बराबर गित करता हुअ अगे को बह रहा है। शरीर के तत्ि हर घड़ी बदल रहे हं। अज जो रासायिनक पदाथा एक िनस्पित्त मं है िह कल भोजन द्वारा हमारे शरीर मं पहुँचेगा और परसं मल रूप मं िनकलकर ऄन्य जीिं के शरीर का ऄंग बन जायगा। डाक्टर बताते हं कक शारीठरक कोष हर घड़ी बदल रहे हं पुराने नष्ट हो जाते हं और ईनके स्थान पर नये अ जाते हं। यद्यिप देखने मं शरीर ज्ययं का त्यं रहता है पर कु छ ही समय मं िह िबलकु ल बदल जाता है और पुराने शरीर का एक कण भी बाकी नहं बचता। िायु जल और भोजन द्वारा निीन पदाथा शरीर मं प्रिेश करते हं और श्वास कक्रया तथा मल त्याग के रूप मं बह रहे हं। नदी-तल मं पड़े हुए कछु ए के उपर होकर निीन जलधारा बहती रहती है तथािप िह के िल आतना ही ऄनुभि करता है कक पानी मुझे घेरे हुए है और मं पानी मं पड़ा हुअ हूँ। हम लोग भी ईस िनरन्तर बहने िाली प्रकृ ित-धारा से भलीभाँित पठरिचत नहं होते तथािप िह पल भर भी िहरे िबना बराबर गित करती रहती है। यह मनुष्य शरीर तक ही सीिमत नहं िरन् ऄन्य जीिधाठरयं िनस्पितयं और िजन्हं हम जड़ मानते हं ईन सब पदाथं मं होती हुइ अगे बिती रहती है। हर चीज हर घड़ी बदल रही है। ककतना ही प्रयत्र क्यं न ककया जाय आस प्रिाह की एक बूँद को क्षण भर भी रोककर नहं रखा जा सकता यह भौितक सत्य अध्याित्मक सत्य भी है। िकीर गाते हं- यह दुिनयाँ अनी जानी है । भौितक रव्य प्रिाह को तुम समझ गये होगे। यही बात मानिसक चेतनाओं की है। ििचारधाराएँ शब्दाििलयाँ संकल्प अकद का प्रिाह भी िीक आसी प्रकार जारी है। जो बातं एक सोचता है िही बात दूसरे के मन मं ईिने लगती है। दुराचार के ऄड्डों का िातािरण ऐसा घृिणत होता है कक िहाँ जाते-जाते नये अदमी का दम घुटने लगता है। शब्दधारा ऄब िैज्ञािनक यन्त्रं के िश मं अ गइ है। रे िडयो बेतार का तार शब्द-लहरो का प्रत्यक्ष प्रमाण है। मिस्तष्क मं अने-जाने िाले ििचारं के ऄब िोटो िलए जाने लगे हं िजससे यह पता चल जाता है कक ऄमुक अदमी ककन ििचारं को ग्रहण कर रहा है और कै से ििचार छोड़ रहा है बादलं की तरह ििचार प्रिाह अकाश मं मँडराता रहता है और लोगं की अकषाण शिि द्वारा खंचा ि िं का जा सकता है। मन के तीनं ऄंग-प्रिृत्त मानस प्रबुद्घ मानस अध्याित्मक मानस भी ऄपने स्ितंत्र प्रिाह रखते हं ऄथाात् यं समझना चािहए कक िनत्यः सिागत स्थाणु रचलो यं सनातनः। अत्मा को छोड़कर शेष सम्पूणा शारीठरक और मानिसक परमाणु गितशील हं। यह सब िस्तुएँ एक स्थान से दूसरे स्थानं को चलती रहती हं। िजस प्रकार शरीर के पुराने तत्ि अगे बिते और नये अते रहते हं ईसी प्रकार मानिसक पदाथं के बारे मं भी समझना चािहए। ईस कदन अपका िनश्वय था कक अजीिन ब्रह्राचारी रहूँगा अज ििषय भोगं से नहं ऄघाते। ईस कदन िनश्वय था ऄमुक व्यिि की जान लेकर ऄपना बदला चुकाउँगा अज ईनके िमत्र बने हुए हं। ईस कदन रो रहे थे कक ककसी भी प्रकार धन कमाना चािहए अज सब कु छ त्याग कर सन्यासी हो रहे हं। ऐसे ऄसंख्य पठरितान होते रहते हं। क्यं आसिलए कक पुराने ििचार चले गये और नये ईनके स्थान पर अ गये। ििश्व की दृश्य-ऄदृश्य सभी िस्तुओं की गितशीलता की धारणा ऄनुभूित और िनष्ठा यह ििश्वास करा सकती है कक सम्पूणा संसार एक है। एकता के अधार पर ईसका िनमााण है। मेरी ऄपनी िस्तु कु छ भी नहं है या सम्पूणा िस्तुएँ मेरी हं। तेज बहती हुइ नदी के बीच धार मं तुम्हं खड़ा कर

कदया जाय और पूछा जाय कक पानी के ककतने और कौन से परमाणु तुम्हारे हं तब क्या ईत्तर दोगे ििचार करोगे कक पानी की धारा बराबर बह रही है। पानी के जो परमाणु आस समय मेरे शरीर को छू रहे हं पलक मारते-मारते बहुत दूर िनकल जायंगे। जल-धारा बराबर मुझसे छू कर चलती जा रही है तब या तो सम्पूणा जल धारा को ऄपनी बनाउँ या यह कहूँ कक मेरा कु छ भी नहं है यह ििचार कर सकते हो। संसार जीिन और शिि का समुर है। जीि आसमं होकर ऄपने ििकास के िलए अगे को बिता जाता है और ऄपनी अिश्यकतानुसार िस्तुएँ लेता और छोड़ता जाता है। प्रकृ ित मृतक नहं है। िजसे हम भौितक पदाथा कहते हं ईसके समस्त परमाणु जीिित हं। िे सब शिि से ईत्तेिजत होकर लहलहा चल सोच और जी रहे हं आसी जीिित समुर की सत्ता के कारण हम सबकी गितिििध चल रही है। एक ही तालाब की हम सब मछिलयाँ हं। ििश्व व्यापी शिि चेतना और जीिन के परमाणु िििभन्न ऄिभमािनयं को झंकृत कर रहे हं। ईपरोि ऄनुभूित अत्मा के ईपकरणं और िस्त्रं के ििस्तार के िलए कािी है। हमं सोचना चािहए कक यह सब शरीर मेरे हं िजनमं एक ही चेतना ओत-प्रोत हो रही है। िजन भौितक िस्तुओं तक तुम ऄपनापन सीिमत रख रहे हो ऄब ईससे बहुत अगे बिना होगा और सोचना होगा कक आस ििश्व सागर की आतनी बूँदं ही मेरी हं यह मानस भ्रम है। मं आतना बड़ा िस्त्र पहने हुए हूँ िजसके ऄंचल मं समस्त संसार ढँका हुअ है । यही अत्म-शरीर कर ििस्तार है। आसका ऄनुभि ईस श्रेणी पर ले पहुँचेगा िजस पर पहुँचा हुअ मनुष्य योगी कहलाता है। सिाव्यापी ऄनन्त चेतना मं एकीभाि से िस्थत रूप योग से युि हुए अत्मा िाला तथा सबमं समभाि से देखने िाला योगी अत्मा को सम्पूणा भूतं मं और सम्पूणा भूतं को अत्मा मं देखता है। ऄपने पठरधान का ििस्तार करता हुअ सम्पूणा जीिं के ब्रह्म स्िरूपं मं अत्मीयता का ऄनुभि करता है। अत्माओं की अत्माओं मं तो अत्मीयता है ही ये सब अपस मं परमात्म सत्ता द्वारा बँधे हुए हं। ऄिधकारी अत्माएँ अपस मं एक हं। आस एकता के इश्वर िबलकु ल िनकट है। यहाँ हम परमात्मा के दरबार मं प्रिेश पाने योग्य और ईनमं घुल-िमल जाने योग्य होते हं िह दशा ऄिनिाचनीय है। आसी ऄिनिाचनीय अनन्द की चेतना मं प्रिेश करना समािध है और ईनका िनिश्चत पठरणाम अजादी स्ितन्त्रा स्िराज्यय मुिि मोक्ष होगा। एकता ऄनुभि करने का ऄभ्यास ध्यानािस्थत होकर भौितक जीिन प्रिाह पर िचत्त जमाओ। ऄनुभि करो कक समस्त ब्रहृमाण्डं मं एक ही चेतना शिि लहरा रही है ईसी के समस्त ििकार भेद से पंचतत्ि िनर्तमत हुए हं। आिन्रयं द्वारा जो िििभन्न प्रकार के सुख-दुखमय ऄनुभि होते हं िह तत्िं की िििभन्न रासायिनक प्रकक्रया हं जो आिन्रयं के तारं से टकराकर िििभन्न पठरिस्थितयं के ऄनुसार िििभन्न प्रकार की झंकारं ईत्पन्न करती हं। समस्त लोकं का मूल शिि तत्ि एक ही है और ईसमं मं भी ईसी प्रकार गित प्राप्त कर रह हूँ जैसे दूसरे। यह एक साझे का कम्बल है िजसमं िलपटे हुए हम सब बालक बैिे हं। आस सच्चाइ को ऄच्छी तरह कल्पना मं लाओ बुिद्घ को िीक-िीक ऄनुभि करने समझने और हृदय को स्पष्टतः ऄनुभि करने दो। स्थूल भौितक पदाथं की एकता का ऄनुभि करने के बाद सूक्ष्म मानिसक तत्ि की एकता की कल्पना करो। िह भी भौितक रव्य की भाँित एक ही तत्ि है। तुम्हारा मन महामन की एक बूँद है। जो ज्ञान और ििचार मिस्तष्क मं भरे हुए हं िह मूलतः सािाभौम ज्ञान और ििचारधारा के कु छ परमाणु हं और ईन्हं पुस्तकं द्वारा गुरु-मुख द्वारा या इथर-अकाश मं बहने िाली धाराओं से प्राप्त ककया जाता है। यह भी एक ऄखण्ड गितमान शिि है और ईसका ईपयोग िैसे ही कर रहे हो जैसे नदी मं पड़ा हुअ कछु अ ऄििचल गित से बहते हुए जल-परमाणुओं मं से कु छ को पीता है और किर ईसी मं मूत्र रूप मं त्याग देता है। आस सत्य को भी बराबर हृदयंगम करो और ऄच्छी तरह मानसपटल पर ऄंककत कर लो। ऄपने शारीठरक और मानिसक िस्त्रं के ििस्तार की भािना दृि होते ही संसार तुम्हारा और तुम संसार के हो जाओगे। कोइ िस्तु ििरानी न मालूम पड़ेगी। यह सब मेरा है या मेरा कु छ भी नहं

आन दोनं िाक्यं मं तब तुम्हं कु छ भी ऄन्तर मालूम न पड़ेगा। िस्त्रं से उपर अत्मा को देखो यह िनत्य ऄखण्ड ऄजर ऄमर ऄपठरितानशील और एकरस है। िह जड़ ऄििकिसत नीच प्रािणयं तारागणं ग्रहं समस्त ब्रह्माण्ड को प्रसन्नता और अत्मीयता की दृिष्ट से देखता है। ििराना घृणा करने योग्य सताने के लायक या छाती से िचपका रखने के लायक कोइ पदाथा िह नहं देखता। ऄपने घर और पिक्षयं के घंसले के महत्ि मं ईसे तिनक भी ऄन्तर नहं दीखता। ऐसी ईच्च कक्षा को प्राप्त हो जाना के िल अध्याित्मक ईन्नित और इश्वर के िलए ही नहं िरन् संसाठरक लाभ के िलए भी अिश्यक है। आस उँचे टीले पर खड़ा होकर अदमी संसार का सच्चा स्िरूप देख सकता है और यह जान सकता है कक ककस िस्थित मं ककससे क्या बतााि करना चािहए ईसे सद्गुणं का पुञ्ज ईिचत कक्रया कु शलता और सदाचार सीखने नहं पड़ते िरन् के िल यही चीजं ईसके पास शेष रह जाती हं और िे बुरे स्िभाि न जाने कहाँ ििलीन हो जाते हं जो जीिन को दुखमय बनाये रहते हं। यहाँ पहुँचा हुअ िस्थत-प्रज्ञ देखता है कक सब ऄििनाशी अत्माएँ यद्यिप आस समय स्ितंत्र तेज स्िरूप और गितिान प्रतीत होती हं तथािप ईनकी मूल सत्ता एक ही है िििभन्न घटं मं एक ही अकाश भरा हुअ है और ऄनेक जलपात्रं मं एक ही सूया का प्रितिबम्ब झलक रहा है। यद्यिप बालक का शरीर पृथक् है परन्तु ईसका सारा भाग माता- िपता के ऄंश का ही बना है। अत्मा सत्य है पर ईसकी सत्यता परमेश्वर है। ििशुद्ध और मुि अत्मा परमात्मा है ऄन्त मं अकर यहाँ एकता है। िहं िह िस्थत है िजस पर खड़े होकर जीि कहता है- सोऽहमिस्म ऄथाात् िह परमात्मा मं हूँ और ईसे ऄनुभूित हो जाती है कक संसार के सम्पूणा स्िरूपं के नीचे एक जीिन एक बल एक सत्ता एक ऄसिलयत िछपी हुइ है। दीिक्षतं को आस चेतना मं जग जाने के िलए हम बार-बार ऄनुरोध करं गे क्यंकक मं क्या हूँ आस सत्यता का ज्ञान प्राप्त करना सच्चा ज्ञान है। िजसने सच्चा ज्ञान प्राप्त कर िलया है ईसका जीिन प्रेम दया सहानुभूित सत्य और ईदारता से पठरपूणा होना चािहए। कोरी कल्पना या पोथी- पाि से क्या लाभ हो सकता है सच्ची सहानुभूित ही सच्चा ज्ञान है और सच्चे ज्ञान की कसौटी ईसका जीिन व्यिहार मं ईतारना ही हो सकता है। १-मेरी भौितक िस्तुएँ महान् भौितक तत्ि की एक क्षिणक झाँकी हं। २ मेरी मानिसक िस्तुएँ ऄिििच्छन्न मानस तत्ि का एक खण्ड हं। ३- भौितक और मानिसक तत्ि िनबााध गित से बह रहे हं आसिलए मेरी िस्तुओं का दायरा सीिमत नहं। समस्त ब्रह्माण्डं की िस्तुएँ मेरी हं। ४- ऄििनाशी अत्मा परमात्मा का ऄंश है और ऄपने ििशुद्घ रूप मं िह परमात्मा ही है। ५- मं ििशुद्घ हो गया हूँ परमात्मा और अत्मा की एकता का ऄनुभि कर रहा हूँ।

Collection by… BB WES

Related Documents

About Me
April 2020 28
About Me
May 2020 31
About Me
May 2020 3
About Me
December 2019 24
About Me
November 2019 24
About Me
June 2020 7